Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 10, ISSUE 2 (2024)
लौटे हुए मुसाफिर और विभाजन की त्रासदी
Authors
मुहम्मद महताब खाँ
Abstract
भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता के लिए जानी जाती है। ’वसुधैव कुटुंबकम’ हमारे देश की सांस्कृति सोच का अभिन्न अंग रहा है। लेकिन कभी-कभी हमारे अपने ही कुटुंब की नाव तूफान में घिर जाती है। ’लौटे हुए मुसाफिर’ भारत के एक ऐसे ही तूफानी दौर की कथा है जब अपने ही कुटुंब में दीवार खड़ी हो जाती है। यह दीवार अपने आप ही नहीं बन जाती बल्कि इसके पीछे अपने स्वार्थ को साधने वाली टोपियों और टीकों की टोलियाँ काम कर रही थीं। धर्म के नाम पर होने वाले विभाजन के पीछे सदैव स्वार्थ और सुविधा की दुर्गध छिपी होती है। कमलेश्वर एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी की गहरी पड़ताल की है। इसके कारण और परिणाम को गहराई से समझा है। इनका उपन्यास ’लौटे हुए मुसाफिर’ विभाजन और हिन्दू-मुस्ल्मि के बीच बढ़ती दूरियों को आधार बनाकर लिखा गया है। यहाँ एक ऐसी बस्ती की कहानी है जिसमें रहने वाले हिन्दू-मुस्लिम दोनों भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन 1945 के बाद विभाजन की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने पर दोनों के बीच नफरत की दीवार खड़ी हो जाती है। कुछ असामाजिक तत्वों ने अपना स्वार्थ साधने के लिए इस नफरत को हवा दी। इसके परिणाम स्वरुप विभाजन हुआ और उस बस्ती के मुसलमान भी पाकिस्तान चले गये। लेकिन कुछ साल बाद अपने दुख और उत्पीड़न का बोझ लिए कुछ लोग पाकिस्तान से वापस इसी बस्ती में आ गये। ’लौटे हुए मुसाफिर’ उपन्यास की यह बस्ती पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। यह उपन्यास यह संदेश देता है कि जब तक हम अपने दिलों से नफरत नहीं निकालते, तब तक विभाजन किसी न किसी रुप में होता रहेगा। इसीलिए यह उपन्यास आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
Download
Pages:20-21
How to cite this article:
मुहम्मद महताब खाँ "लौटे हुए मुसाफिर और विभाजन की त्रासदी". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 2, 2024, Pages 20-21
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.