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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 10, ISSUE 2 (2024)
कबीर के काव्य में ‘लोक’
Authors
अमित कुमार सिंह, सुनीता रानी घोष
Abstract
कबीरदास जी निर्गुण संत साहित्य काव्य धारा के अग्रणी कवि हैं। उनकी रचनाओं में संत-भाव और काव्य दोनों ही विद्यमान हैं तथा दोनों ही एक दुसरे के पूरक हैं। कबीर के काव्य में भाषा के अनेक रंग दिखाई देते हैं। उन्होंने काव्यशास्त्रियों को लुभाने के लिए नहीं अपितु लोक मानस को उनकी ही भाषा में समझाने के लिए लिखा है। कबीर की वाणियों में आध्यात्मिकता भी है और भाषा की कुशलता भी। कबीरदास जी ने अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को जनसामान्य की भाषा में सीधे सरल शब्दों में पिरोया है। कबीरदास जी देवत्त्व को मनुष्यत्व में ढाल कर लोक के समक्ष परोसते हैं। लोकतत्वों के प्रयोग से सराबोर उनके काव्य लोक के आखरी व्यक्ति तक पहुँचने का मार्ग हैं। अनपढ़, अकृत्रिम, सरल लोक मानस को वे अपना श्रोता मानते हैं। कबीर लोकमानस को समझाने के लिए हर प्रयास करते हैं। कभी वे दुल्हन बन जाते हैं और प्रियतम की प्रतीक्षा करते हैं तो कभी गौने की रीति का निर्वाह करते हैं, कभी वे सेज पर बैठ प्रियतम का इंतज़ार करते हैं तो कभी सती की तरह प्रियतम के साथ जल मरने की बात कहते हैं। लोक को लोक की भाषा में समझाने का प्रयास जो कबीरदास जी ने किया है वह कहीं और देखने को नहीं मिलता है।
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Pages:11-13
How to cite this article:
अमित कुमार सिंह, सुनीता रानी घोष "कबीर के काव्य में ‘लोक’". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 2, 2024, Pages 11-13
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