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VOL. 10, ISSUE 2 (2024)
हिंदी के दलित साहित्य में स्त्री जीवन
Authors
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता
Abstract
20वीं शताब्दी का ’छठवां दशक’ साहित्य जगत के लिए बेहद उठा पटक और बदलाव का समय है। यह समय ज्ञान की अवस्था के बदलाव का समय है क्योंकि समाज व संस्कृति, इस समय उत्तर औद्योगिक युग और उत्तर आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका था। यह समय महावृत्तांत के विरूद्ध का समय है, जिसके कारण नए विमर्शों का उदय होता हैं। भारतीय समाज प्रमुखतः लिंग- भेद के आधार पर, जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर ही समाज का विभाजन करता है। चाहे हमारा संविधान कितना भी समानता और अस्पृश्यता को दूर करने की बात करता है पर समाज का विभाजन इन्हीं आधार पर किया जाता है। समाज के इन ठेकेदारों का मानना है कि स्त्रियों घर की चारदीवारियों में पर्दे में ही कैद ठीक लगती है। एक स्त्री की पहचान केवल माँ, पत्नी, बेटी के परिधि में ही सिमटी हुई हैं। स्त्री और निम्न जाति को मनु से लेकर अभी तक के इस लंबे दौर में हमेशा संघर्ष करना पड़ा है। लेकिन एक स्त्री और वो भी दलित वर्ग से हो तो उसके संघर्ष का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है। दलित स्त्री को केंद्र में रख कर अनेक साहित्यिक रचना हुई जिसमें स्त्री के हीन दशा को दर्शाया गया है। जिसमें ’शोषण’ जैसी घटना का वर्णन प्रमुख है। ऐसी अनेक स्त्रियाँ है जिनके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए कई-कई बार उनका शोषण हुआ पर उसकी कोई सुनवाई नहीं हो पाई और यहां तक की एक स्त्री का शोषण होने के बाद बदनामी भी उसी की होती है। स्त्री शोषण को सहज और स्वाभाविक मान्यता के रूप में समाज के मन मसित्ष्क में बैठाने की निरंतर कोशिश की गई। समय-समय पर विभिन्न शक्तियों से गठजोड़ करके इसने अपना रूप भी बदला पर मौजदूगी सामन्तवादी व्यवस्था से लेकर पूंजीवादी और अब बाजारवादी व्यवस्था की आंतरिक संरचना में भी अनेक स्तरों पर बनी हुई है। इसका उद्देश्य स्त्री के वास्तविक अस्तित्त्व और स्वप्नों का सदा के लिए दमन करना और पौरुषपुर्ण वचस्ववादी समाज में स्त्री के लिए समानता और न्याय की संभावनाओं को समाप्त करना रहा है।
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Pages:21-23
How to cite this article:
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता "हिंदी के दलित साहित्य में स्त्री जीवन". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 2, 2024, Pages 21-23
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