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VOL. 11, ISSUE 1 (2025)
प्रवासी साहित्य में भारतीय बोध (मॉरीशस का प्रवासी साहित्य)
Authors
ज्योति झा
Abstract
19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन के दौरान बहुत से भारतीय किसान और मजदूरों को मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो आदि देशों में ले जाया गया। इसके लिए इन्हें बहुत से प्रलोभन दिए गए, इन्हें यह बताया गया कि यहां मिट्टी के नीचे से सोना मिलता है। गिरमिट या एग्रीमेंट प्रथा के अंतर्गत इनके सामने बहुत सी लुभावने शर्तें रखी गई। इन्हीं शर्तों और यहां की उपनिवेश कालीन आर्थिक विसंगतियों के कारण, उत्तर भारत से बहुत से लोग मॉरीशस गए। जब वे वहां पहुंचे तो स्थिति इसके ठीक विपरीत थी। इन विपरीत परिस्थिति में इनका संबल भारतीय संस्कृति, धर्म, भारतीय मूल्य बोध बना। जो इनका आत्म संबल तो बना ही साथ ही, इन्हें एक सूत्र में पिरोये रखा। इसी की अभिव्यक्ति इनके द्वारा रचित साहित्य में हुई है। जिसे हम प्रवासी साहित्य के अंतर्गत पढ़ते और जानते है।
इन्होंने अपने साहित्य में भारत को सदैव जन्मभूमि के रूप में रेखांकित किया है। ये भारतीय संस्कृति की जड़ों को सदैव अपने भीतर सिंचित करते रहे हैं। इसी को इन्होंने अपने साहित्य कहानियों,कविताओं और उपन्यासों में व्यक्त किया है। इसमें भारतीय समाज में मनाये जाने वाले त्योहार, पूजा पद्धतियों, रीति रिवाज, पारिवारिक मूल्यों को व्यक्त किया गया है। दीपावली, होली, रामायण पाठ, शिवरात्रि जैसे पर्वों का वर्णन उल्लास के साथ किया गया है। इसके अतिरिक्त इनकी रचनाओं में मातृभूमि से बिछड़ने की पीड़ा, यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परंपराओं के प्रति मोह भी इनके साहित्य में देखने को मिलता है। ये प्रवासी मजदूर मॉरीशस गए तो, लेकिन सदैव इन्होंने भारत को अपने हृदय में संजो कर रखा। यह भारत बोध ही प्रवासी समुदाय को कभी टूट कर बिखरने नहीं दिया। इतना ही नहीं यह बोध ही इनका संबल बना। इन्हीं के कारण आज भारतीय समाज और संस्कृति का प्रसार मॉरीशस में है। आज आधुनिक मॉरीशस के निर्माण में भारतवंशियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
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Pages:83-86
How to cite this article:
ज्योति झा "प्रवासी साहित्य में भारतीय बोध (मॉरीशस का प्रवासी साहित्य)". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 1, 2025, Pages 83-86
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