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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
२१ वीं सदी की हिंदी ग़ज़लों में अभिव्यक्त आर्थिक चेतना
Authors
डॉ. विजय लोहार
Abstract
हिंदी ग़ज़लों का कथ्यगत फलक यथार्थवादी, मानवतावादी और जनवादी रहा है। समाज में परिलक्षित हर तरह की विसंगति को लेकर हिंदी ग़ज़लकारों ने अक्सर बहुत- सी गज़लें लिखी गई हैं। जिससे कि हिंदी ग़ज़ल की सामाजिक प्रतिबद्धता नज़र आती है। समाज में दीखने वाली वर्गगत विषमता पर अनेक ग़ज़लकारों ने लेखनी चलाई। इसमें अमीरी गरीबी की खाई, शहर और गांव के परिवेश की सच्चाई, दूर दराज गिरि -कंदारों में निवास करने वाले आदिवासी जनजातियों का आर्थिक पिछड़ापन आदि अनेक बातों पर गज़लकार बड़े ही असरदार तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं। आजाद भारत में अनेक क्षेत्रों में जो मोहभंग उभरा, उसको उभारने में ग़ज़लकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बिसवीं सदी के अंततक देश में अनेक तब्दीलियाँ हो रही थी। इन बदलावों के असर आगे २१ वी सदी के आंरभिक वर्षों तक देखने को मिला। इसकी आहट हिंदी ग़ज़लों में भी मिल जाती है। हिंदी ग़ज़लों में आर्थिक चेतना की बात करें तो इन ग़ज़लों में अमीर -गरीब, पूंजीपतियों की कारगुजारियां, मिल मजदूरों में आंदोलन, बंधुआ मजदूरों की पीड़ा, खेतिहर-श्रमिकों का शोषण, किसानों के भांति-भांति की परेशानियाँ, हाथों से काम करने वालों के दुःख-दर्द, बढ़ती हुई बेरोज़गारी, महंगाई की मार, पहाड़ों में गुजर करने वाले आदिवासियों के प्रश्न आदि अनेक आयामों पर ग़ज़लकारों ने यथार्थ और प्रभावशाली प्रस्तुति की है।
हिंदी ग़ज़लों का कथ्यगत फलक यथार्थवादी, मानवतावादी और जनवादी रहा है। समाज में परिलक्षित हर तरह की विसंगति को लेकर हिंदी ग़ज़लकारों ने अक्सर बहुत- सी गज़लें लिखी गई हैं। जिससे कि हिंदी ग़ज़ल की सामाजिक प्रतिबद्धता नज़र आती है। समाज में दीखने वाली वर्गगत विषमता पर अनेक ग़ज़लकारों ने लेखनी चलाई। इसमें अमीरी गरीबी की खाई, शहर और गांव के परिवेश की सच्चाई, दूर दराज गिरि -कंदारों में निवास करने वाले आदिवासी जनजातियों का आर्थिक पिछड़ापन आदि अनेक बातों पर गज़लकार बड़े ही असरदार तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं। आजाद भारत में अनेक क्षेत्रों में जो मोहभंग उभरा, उसको उभारने में ग़ज़लकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बिसवीं सदी के अंततक देश में अनेक तब्दीलियाँ हो रही थी। इन बदलावों के असर आगे २१ वी सदी के आंरभिक वर्षों तक देखने को मिला। इसकी आहट हिंदी ग़ज़लों में भी मिल जाती है। हिंदी ग़ज़लों में आर्थिक चेतना की बात करें तो इन ग़ज़लों में अमीर -गरीब, पूंजीपतियों की कारगुजारियां, मिल मजदूरों में आंदोलन, बंधुआ मजदूरों की पीड़ा, खेतिहर-श्रमिकों का शोषण, किसानों के भांति-भांति की परेशानियाँ, हाथों से काम करने वालों के दुःख-दर्द, बढ़ती हुई बेरोज़गारी, महंगाई की मार, पहाड़ों में गुजर करने वाले आदिवासियों के प्रश्न आदि अनेक आयामों पर ग़ज़लकारों ने यथार्थ और प्रभावशाली प्रस्तुति की है।
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Pages:5-8
How to cite this article:
डॉ. विजय लोहार "२१ वीं सदी की हिंदी ग़ज़लों में अभिव्यक्त आर्थिक चेतना". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 5-8
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