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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
भारतीय संस्कृति में पर्यावरणीय चिन्तन
Authors
डॉ. धर्मेंद्र कुमार शर्मा
Abstract
आदिमानव से लेकर सभ्य एवं सुसंस्कृत मानवीय संवेेदनायुक्त मनुष्य तक की मानवीय यात्रा का ऐतिहासिक विहंगावलोकन करने पर यह भली-भाँति दृष्टिगत होता है कि भारतीय संस्कृति का पर्यावरणीय चिन्तन अतुलनीय है। संसार में मानव एक चिन्तनशील प्राणी है और उसने अपनी चेतना द्वारा संस्कृति का निर्माण किया, इसलिए संस्कृति का जन्म मनुष्य के मध्य ही होता है। यदि वास्तव में प्राचीन भारतीय संस्कृति परम्परा पर दृष्टिगत करें तो हम देखते हैं कि इसका पर्यावरण के प्रति प्रेम इतना प्रबल है कि सांस्कृतिक विकास की दिशा भी पर्यावरण के माध्यम से ही तय होती है। ऋषियों ने प्रकृति के साथ तारतम्य स्थापित कर जीवन की नवीन परिपाटी का विकास किया तथा ऐसी सभ्यता का निर्माण किया जो प्रकृति से पूरी तरह घुल-मिल गई। इसी विशेषता ने प्राचीन भारतीय संस्कृति को अरण्यक संस्कृति या तपोवनी संस्कृति की अज्ञा से अलंकृत किया है। इस शोध-पत्र में आदिमानव सभ्यता से लेकर वर्तमान की सभ्य एवं सुसंस्कृत मानवीय संवेेदनायुक्त मनुष्य तक की मानवीय यात्रा का वर्णन एवं विष्लेषण किया गया है।
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Pages:3-4
How to cite this article:
डॉ. धर्मेंद्र कुमार शर्मा "भारतीय संस्कृति में पर्यावरणीय चिन्तन". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 3-4
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