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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
सौन्दर्य-चेतना और जायसी के पद्मावत का परिप्रेक्ष्य
Authors
डॉ. गरिमा सिंह
Abstract
‘पद्मावत’ केवल ‘प्रेमकाव्य’ नहीं बल्कि ‘मानव-प्रेम’ की कथा कहने वाला विराट उदात्त-चेतना का काव्य है। स्वभावतः सौन्दर्य उस कथा की मूल-चेतना है। सौन्दर्य का चित्रण जितना विशद, पूर्ण और प्रभावशाली होगा, प्रेम उतना ही विशद, पूर्ण और सर्वव्यापी बन सकेगा। ‘पद्मावत’ में पद्मावती के सौन्दर्य के माध्यम से व्यक्त प्रेम पूर्वार्द्ध अर्थात् ‘स्वप्न’ और उत्तरार्द्ध अर्थात् ‘यथार्थ’ की कथा को जोड़कर एक गहरी विशाद-दृष्टि की सृष्टि करता है। ‘पद्मावत’ में व्यक्त सौन्दर्य मुख्यतः रूप-सौन्दर्य तक ही सीमित नहीं है बल्कि सौन्दर्य के तीन गहरे संस्तर, रूप सौन्दर्य, भाव-सौन्दर्य एवं कर्म सौन्दर्य तक भी विस्तृत है। सौन्दर्य के इन तीन बिन्दुओं पर ‘पद्मावत’ की समग्र कथा शरीरी-अशरीरी के द्वन्द्व से निकलकर वायुवीय नहीं बल्कि मानवीय प्रेम की अनुगूँज बन जाती है। जिसे कहना कवि जायसी का साहित्यिक लक्ष्य-सा जान पड़ता है।
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Pages:29-33
How to cite this article:
डॉ. गरिमा सिंह "सौन्दर्य-चेतना और जायसी के पद्मावत का परिप्रेक्ष्य". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 29-33
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