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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
हिंदी कथेतर साहित्य में संस्मरण का भविष्य
Authors
ऋचा प्रिया
Abstract

आधु‌निक हिंदी साहित्य  में कथेतर गद्य की यथार्थपरक और कलात्मक विद्या है 'संस्मरण’। इसकी उत्पति 'स्म' धातु में 'सम' उपसर्ग और 'ल्युट' (अण) प्रत्यय के योग से हुई है। जिस‌का अर्थ है सम्यक अर्थात पूर्णरूपेण स्मरण करना।  इसमें 'स्मृति' का महत्वपूर्ण स्थान है। वैसे तो प्राचीन भारतीय साहित्य में बीज रूप में इसकी उपस्थिति पूर्व से स ही मेघदूतम्, थैर-थेरी गाथा, जातक कथाओं आदि में मौजूद है, किन्तु साहित्य को स्वतंत्र विद्या के रूप में यह पाश्चात्य साहित्य के प्रभावस्वरूप बीसी शताब्दी के आस-पास अस्तित्व में आती है। अपनी विशिष्ट स्मृतियों को लेखक द्वारा जब सत्यता, तथ्यता, आत्मीयता, रोचकता आदि का ध्यान रखते हुए विशिष्ट भाषा शैली में कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, हो तब संस्मरण जैसी विद्या का निर्माण होता है। इसका फलक छोटा। करता है। जितना विस्तृत है, उतना ही इसका कलेवर 'गागर में सागर भरने की उक्ति को व्याख्यायित करता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में जहाँ लोग अपने समयाभाव को लेकर चिंतित हैं, वहाँ अपनी प्रेरणा के लिए उनका झुकाव जीवनी, आत्मकथा जैसी विस्तृत विधा को छोड़‌कर संस्मरण की और ही अधिक बढ़ रहा है। आज संस्मरण कथेतर गद्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। इसके माध्यम से कम समय में हर क्षेत्र की सत्य घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके माध्यम से संस्मरणकार पाठकों को प्रेरित करने के साथ-साथ जागरूक करने का भी कार्य करता है। साथ ही उसके माध्यम से वे लोग भी स्वयं को अभिव्यक्त कर पाते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति को देश,समाज, परिवार किसी भी स्तर पर दबाया जाता है। यह लोगों से जुड़ने का सरल और प्रभावशाली माध्यम है। भविष्य में यह विधा और अधिक विस्तार पाकर आत्मकथा, जीवनी, डायरी, रेखाचित्र यात्रा-वृतांत आदि का स्थान ले लेगी। इसके छोटे और उप‌योगी रूप को देखकर इसका शताब्दियों तक कथेतर गद्य की लोकप्रिय विधा के रूप में बने रहना सहज संभाव्य है।

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Pages:69-71
How to cite this article:
ऋचा प्रिया "हिंदी कथेतर साहित्य में संस्मरण का भविष्य". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 69-71
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