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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
स्वभाषा: स्वाभिमान और संस्कृति की प्रतीक
Authors
डॉ. उमा जनागल
Abstract
यह
आलेख स्वभाषा के महत्व, उसकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय भूमिका पर
प्रकाश डालता है। भाषा न केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि वह हमारी अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान की
पहचान भी है। हिंदी, एक जीवंत भाषा होने के साथ-साथ, संपर्क भाषा, राजभाषा और साहित्यिक भाषा के रूप में
अपने विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति करती है। वर्तमान वैश्वीकरण के युग में भी यह
आवश्यक है कि हम अपनी स्वभाषा को अपनाएं और उसमें आत्मनिर्भरता विकसित करें। यह आलेख
हिन्दी भाषा के ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक
और तकनीकी पक्षों को समग्रता से प्रस्तुत करता है।
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Pages:38-42
How to cite this article:
डॉ. उमा जनागल "स्वभाषा: स्वाभिमान और संस्कृति की प्रतीक ". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 38-42
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