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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
दलित आत्मकथाओं में राजनीतिक चेतना और आंदोलनों का प्रभाव
Authors
रविंद्र कुमार गौतम
Abstract
यह शोधपत्र हिंदी दलित आत्मकथाओं में व्यक्त राजनीतिक चेतना, सामाजिक संघर्षों तथा आंदोलनों की प्रतिध्वनियों का सम्यक् विश्लेषण प्रस्तुत करता हैदलित आत्मकथाएँ केवल व्यक्तिगत जीवन का विवरण नहीं हैं, बल्कि सामूहिक पीड़ा और ऐतिहासिक अन्याय की सजीव गवाही भी हैंओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, सुशीला टाकभौरे और कुमुद पावड़े जैसे रचनाकारों की आत्मकथाओं में जातिगत भेदभाव, शिक्षा एवं रोजगार की विषमताएँ तथा सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष स्पष्ट रूप से उभरते हैंइन ग्रंथों से यह तथ्य सामने आता है कि दलित आत्मकथाएँ साहित्य और राजनीति के बीच सेतु का कार्य करती हैं जहाँ साहित्य महज़ भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रखर साधन बन जाता हैसाथ ही, इन पर विभिन्न आंदोलनों की गहरी छाप दिखाई देती है, जिसने दलित चेतना को नई दृष्टि और दिशा प्रदान कीयद्यपि इन आत्मकथाओं में कुछ सीमाएँ एवं चुनौतियाँ मौजूद हैं, फिर भी वे समाज में समानता, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान करती हैं

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Pages:56-59
How to cite this article:
रविंद्र कुमार गौतम "दलित आत्मकथाओं में राजनीतिक चेतना और आंदोलनों का प्रभाव ". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 56-59
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