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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
रामचरितमानस में नारी-स्वरूप: मध्यकालीन समाज का प्रतिबिंब
Authors
सोनम कुमारी , प्रो. मंजु शर्मा
Abstract
भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति सदैव जटिल विमर्श का विषय रही है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक स्त्री को पुरुष के अधीन माना गया और उसके स्वतंत्र अस्तित्व को प्रायः नकारा गया। आधुनिक समय में जब स्त्री-विमर्श एक सशक्त विमर्शधारा के रूप में उभरा है, तब साहित्य के क्षेत्र में भी स्त्रियों की स्थिति और उनकी अस्मिता पर गहन विमर्श होने लगा है। ‘रामचरितमानस’ के रचयिता तुलसीदास की नारी-दृष्टि भी इस विमर्श से अछूती नहीं है। तुलसी की दृष्टि एक ओर परंपरापोषित एवं पितृसत्तात्मक समाज की मान्यताओं को प्रतिबिंबित करती है, तो दूसरी ओर उसमें स्त्री की गरिमा और सम्मान के संकेत भी दिखाई देते हैं। अतः तुलसी की नारी-दृष्टि को समझना न केवल तुलसी साहित्य के अध्ययन हेतु, बल्कि मध्यकालीन भारतीय समाज के स्त्री-स्वरूप को जानने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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Pages:86-89
How to cite this article:
सोनम कुमारी , प्रो. मंजु शर्मा "रामचरितमानस में नारी-स्वरूप: मध्यकालीन समाज का प्रतिबिंब". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 86-89
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