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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
ब्रिटिश शासन में दलित अवस्था और दलित मनोवृत्ति का स्वरूप
Authors
लालचंद, डॉ. अशोक धारनिया
Abstract
औपनिवेशिक काल में दलित समाज की सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का समग्र विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की पारंपरिक जाति व्यवस्था को पूर्णतः समाप्त नहीं किया, बल्कि कई स्तरों पर उसे नई संरचनात्मक जटिलताओं के साथ बनाए रखा। प्रशासनिक नीतियों, भूमि व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और जनगणना की प्रक्रियाओं ने दलित समुदाय की पहचान को एक पृथक सामाजिक वर्ग के रूप में चिह्नित किया। दलितों की दयनीय सामाजिक स्थिति, अस्पृश्यता, आर्थिक शोषण और शिक्षा से वंचित रहने की समस्या ने औपनिवेशिक शासन के दौरान सामाजिक सुधार आंदोलनों, मिशनरी गतिविधियों और आधुनिक शिक्षा के प्रसार ने दलित समाज में आत्मचेतना और आत्म सम्मान की भावना को जन्म दिया। इस परिवेश में दलित मनोवृत्ति में धीरे धीरे परिवर्तन होने लगा, जिसमें दासता की स्वीकृति के स्थान पर अधिकारबोध और प्रतिरोध की भावना विकसित हुई। ब्रिटिश काल दलित समाज के लिए केवल शोषण का काल नहीं था, बल्कि यह जागरण और सामाजिक चेतना के विकास का भी एक महत्वपूर्ण चरण था।
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Pages:113-114
How to cite this article:
लालचंद, डॉ. अशोक धारनिया "ब्रिटिश शासन में दलित अवस्था और दलित मनोवृत्ति का स्वरूप". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 113-114
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