भारतीय संस्कृति वैज्ञानिक आधारों पर
खडी हुई है। भारतीय तत्व-विज्ञानियों ने सामाजिक क्षेत्र में बहुत खोज-बीन करके
ऐसे नियम निर्धारित किए थे, जो प्रचुर फल देनेवाले हैं और आज भी जिनसे समग्र
भारतीय जनता इसका लाभ उठा रही है। हमारे शास्त्रों में आचार को परम धर्म कहा गया
है। भारतीय तत्ववेत्ता यह मानते हैं कि जो सिध्दांत अथवा आचार आचरण में नहीं आ
सकते, अर्थात्वे उपयोगी नहीं हैं और जो धर्म व्यवहार में नहीं आता, जिससे हमारा
दैनिक जीवन और समस्याएँ हल नहीं होतीं, जीवन सुख-शांतिमय नहीं बनता, हम उसे ‘धर्म’
नहीं कह सकते। हमारे संस्कृति में धर्म के अंतर्गत उन सिध्दांतों को स्थान दिया
गया है, जिनसे हमारा नैतिक और आध्यात्मिक ही नहीं, वरन् सामाजिक जीवन भी उन्नत
बनता है।
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