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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
उपभोक्तावादी संस्कृति और भारतीय जीवन
Authors
डॉ. पवन कुमार बालानिया
Abstract
भूमण्डलीकरण के दौर में पूँजीवाद के प्रभाव में फँसे उपभोक्तावादी बाजारीकरण के कारण भारतीय समाज के मायने बदल रहे हैं। इस समय अनेकानेक संकटों से जूझते समाज की संरचना जटिल होती जा रही है। आधुनिक युग में उपभोक्तावादी संस्कृति एक वैश्विक प्रवृत्ति के रूप में उभरकर सामने आई है। इसका मूल आधार व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, पहचान, भौतिकता, सम्पन्नता आदि हैं। इस नई शब्ताब्दी में जब पूरा विश्व नई करवट ले रहा है और हर पल उसका प्रभाव भारतीय जीवन पर पड़ रहा है। भारतीयों को मान्यताएँ, परम्पराएँ और जीवन-मूल्यों में निरन्तर परिवर्तन आ रहा है। उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण मानवीय सरोकारों के साथ-साथ संवेदनाएँ भी बदल गई हैं। भारतीय जीवन में जो परिवर्तन आ रहे हैं, वे एक नए युग की शुरुआत मानी जा सकती है। आज भारतीय जीवन एक नई विश्व-संरचना में दिखाई पड़ रहा है। भारतीय समाज जो परम्परागत रूप से सादगी, संयम, संतोष और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित रहा है, वो अब तीव्र गति से उपभोक्तावादी संस्कृŸिा की ओर अग्रसर हो रहा है। बाजारीकरण, उदारीकरण और तकनीकि विकास ने इस प्रवृत्ति को ओर अधिक बल प्रदान किया है। पाश्चात्य जीवन-शैली का प्रभाव भारतीयों की दैनिक जीवनचर्या में समाहित हो गया है। इस शोध-पत्र में भारतीय जीवन पर उपभोक्तावादी संस्कृŸिा के प्रभावों का बहु-आयामी विश्लेषण किया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि उपभोक्तावादी संस्कृति ने जहाँ जीवन स्तर को सुधारा है, वहीं इसने भारतीय जीवन के समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी है। शोध के अंत में भारतीय समाज के लिए संतुलित जीवन-शैली की दिशा में मार्गदर्शन एवं संभावनाओं को प्रस्तुत किया गया है।
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Pages:24-26
How to cite this article:
डॉ. पवन कुमार बालानिया "उपभोक्तावादी संस्कृति और भारतीय जीवन". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 24-26
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