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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
सत्य की अवधारणा: भारतीय दर्शन और धार्मिक ग्रंथों में विवेचना
Authors
हर्षराम रामस्नेही
Abstract
सत्य की अवधारणा अनेक अर्थों में दी गयी है] किन्तु सत्य के एक ही अर्थ की ओर दृष्टि जाती है जो नित्य हैं. सकारात्मकता से युक्त है. स्वाभाविक है. जिसके होने न होने से हम प्रभावित होते हैं किन्तु हमारे होने न होने से वह प्रभावित नहीं होता है। उदाहरण के रूप में अगर सत्य को जानने का प्रयास करें तो वह उदाहरण स्वरूप होगा – ईश्वर. ब्रह्म.  समय. आप्तवचन-वेद.
जब हम इन सभी को देखते हैं या इनका विचार मात्र आता है] तो हमारे मन में सकारात्मकता का उद्गम होता है यहीं इसका परिणाम स्वरूप है. कि यह सत्य के उदाहरण के रूप में सत्यापित हैं।
अनेक ग्रंथों में खोज के परिणामस्वरूप मैंने अनेक अर्थों में सत्य को देखा।
बृहदारण्यक उपनिषद में आप: (जल) से सत्य की उत्पत्ति बताई है उसके पश्चात सृष्टि की उत्पत्ति बताई है। इस प्रकार ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य भी कहा गया है। जब इन सभी विषयों को देखा तो सत्य को तीन अर्थों में जाना।
एक सत्य ब्रह्म के अर्थ में है। जहाँ कुछ उपनिषदों में ब्रह्म को ही सत्य माना है। शंकराचार्य कहते हैं “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या” अर्थात ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, बाकी सब भ्रम है। 
दूसरा सत्य एक अलग रूप में ईश्वर सत्ता या कोई अद्वितीय शक्ति को माना है। इसके अनुसार प्रत्येक ईश्वर का अनुयायी, उसके ईश्वर को एकमात्र सत्य मानता है। यहाँ भाव एक देव के रूप में है जैसे शिवमहापुराण में भगवान शिव को सत्य माना है उत्पन्न कर्ता माना है। इसी प्रकार अन्य पुराणो में किसी एक विशेष शक्ति (भगवान) को सत्य माना है। 
तीसरा सत्य है अष्टांग योग का यम के उपांग के रूप में सत्य या ग्रंथो में उल्लेखित सदाचार के आयामों में सत्य. जो सामाजिक रूप में तथा आत्म संतुष्टि के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ पर सत्य का अर्थ है झूठ न बोलना. जैसा देखा है वैसा ही बताना आदि. जो सत्य की एक सामान्य अवधारणा है. जिसे उपर से सभी जानते है परन्तु सुक्ष्म स्तर पर नही जानते
इस पत्र में सत्य से संबंधित सभी अव्यवों को जानने का प्रयास करते हुए भारतीय दर्शनो और धार्मिक ग्रंथों में सत्य के प्रारूप को समझने का प्रयास है।

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Pages:45-47
How to cite this article:
हर्षराम रामस्नेही "सत्य की अवधारणा: भारतीय दर्शन और धार्मिक ग्रंथों में विवेचना". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 45-47
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