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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय की कहानियों में ग्राम्य जीवन का यथार्थ चित्रण (‘फ़रिश्ते’ कहानी संग्रह के संदर्भ में)
Authors
सतीश कुमार पाण्डेय
Abstract
समकालीन कथा साहित्य का परिदृश्य आज के समाज की विविधता, जटिलता और परिवर्तनशीलता का प्रतिबिंब है। यह साहित्य पारंपरिक व्यवस्थाओं और धारणाओं को चुनौती देते हुए बदलते समाज की सच्चाई को उकेरता है। यथार्थवादी वर्णन, स्त्री विमर्श, दलित आवाज, आंचलिकता, स्थानीय रंग, सामाजिक सरोकार और सत्ता-विरोध की चेतना यह सब समकालीन कथा की केंद्रीय प्रवृत्तियाँ हैं। समकालीन कहानीकार अपने समय के समाज, संस्कृति और राजनीति के हर कोने की पहचान करते हैं और उसमें छिपी विसंगतियों, असमानता, नवीन सामाजिक जीवन और संघर्ष को कहानी की आत्मा बनाते हैं। रामचंद्र तिवारी हिंदी कहानी के पहलुओं को विवेचित करते हुए कहते हैं –“आज के हिन्दी भाषी के जीवन की विविधता और समस्याओं की जटिलता के हर पहलू को हिन्दी कहानी ने अपने में आवेष्टित कर लिया है। शिल्प, सौन्दर्य और विषय वस्तु दोनों में ही आज की हिन्दी कहानी बारह वर्ष पहले की हिन्दी - कहानी से कहीं आगे है।”1 भाषा आम बोलचाल की, मुहावरों और देशजता से युक्त और शिल्प प्रयोगधर्मी है, जिससे पात्र, परिवेश और अनुभवों में और अधिक सजीवता आ जाती है। आधुनिक काल तक आते-आते हिंदी कथा साहित्य ने पश्चिमी कथाकारों के प्रभाव से नया स्वरूप ग्रहण किया। हालांकि, कथानक, देशकाल, चरित्र चित्रण आदि में पारंपरिक और आधुनिक कहानी-संरचना के तत्व विद्यमान थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी कथा साहित्य पाश्चात्य कहानियों के प्रभाव में आया लेकिन उसने परंपरा से मिले तत्वों का पुनर्गठन किया; कोई पूरी तरह नया निर्माण नहीं किया। इस संक्रमण काल में कहानियों की अलौकिकता, जैसे पशु-पक्षियों का बोलना-चालना, राक्षस, भूत-प्रेत, देवी-देवता, जादू-टोना आदि तत्वों की भूमिका कम हुई। अब कथा साहित्य बुद्धिवाद, वैज्ञानिकता और यथार्थ से जुड़ा और कल्पना की उड़ान में बदलाव आया, फिर भी प्राचीन कहानियों के मूल तत्त्व आज भी मौजूद हैं।
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Pages:77-79
How to cite this article:
सतीश कुमार पाण्डेय "राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय की कहानियों में ग्राम्य जीवन का यथार्थ चित्रण (‘फ़रिश्ते’ कहानी संग्रह के संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 77-79
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