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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
प्रेमचंद के उपन्यासों में यथार्थवाद तथा समाज-सुधार की चेतना
Authors
विशाल प्रताप मित्र
Abstract
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य में यथार्थवादी धारा के
सर्वाधिक सशक्त प्रतिनिधि माने जाते हैं जिनकी रचनाएँ बीसवीं सदी के आरंभिक भारतीय समाज की
जीवंत अनुभूति कराती हैं। उनके उपन्यास केवल कथा नहीं, समाज की चेतना एवं सुधार
का दर्पण भी हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में गोदान, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि जैसे उपन्यासों के माध्यम से प्रेमचंद के यथार्थवाद
के विभिन्न आयामों का विश्लेषण करने का प्रयत्न मात्र किया गया है। इसमें यह
स्पष्ट किया गया है कि प्रेमचंद ने किसानों, स्त्रियों तथा वंचित वर्गों के संघर्ष को केवल
चित्रित ही नहीं किया अपितु उन्हें सामाजिक परिवर्तन की चेतना का प्रतीक भी बनाया।
उनका यथार्थवाद निःसंग वर्णन नहीं बल्कि नैतिक एवं सुधारात्मक है जो संवेदना, नैतिक जागरण तथा
समाज-परिवर्तन की आकांक्षा से जुड़ा है। उनके पात्र यथा होरी, निर्मला, सुमन और सूरदास आदर्श एवं
यथार्थ, आशा और संघर्ष तथा सुधार और प्रतिरोध के
जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। साहित्य और समाजशास्त्र के संगम पर खड़ा यह अध्ययन यह
सिद्ध करता है कि प्रेमचंद का यथार्थवाद केवल समाज का दर्पण नहीं अपितु परिवर्तन
का प्रेरक माध्यम भी है।
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Pages:99-102
How to cite this article:
विशाल प्रताप मित्र "प्रेमचंद के उपन्यासों में यथार्थवाद तथा समाज-सुधार की चेतना". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 99-102
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