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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
जलवायु परिवर्तन का सांस्कृतिक प्रथाओं पर प्रभाव
Authors
शिवम
Abstract
वर्तमान युग विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा औद्योगीकरण का है, जिसने समस्त मानव जाति को भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न किया है। नवीन तकनीकों की सहायता से मनुष्य ने नित-नए आविष्कार किए, जो उसके विकास-पथ को अग्रसर करते रहे हैं। दुर्गम क्षेत्रों तक पहुँचने के लिए लम्बी-चौड़ी सड़कें बनाना, विद्युत आपूर्ति हेतु नदियों पर बाँधों का निर्माण, पहाड़ियों को काट कर कल-कारखाने लगाना आदि; एक ओर सामाजिक प्रगति को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक विनाश को भी आमंत्रित करता है। जलवायु परिवर्तन आज किसी क्षेत्र या देश की नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व की प्रधान समस्या के रूप में उभरा है। इसके फलस्वरूप कभी समय से पहले ही ‘बुरांश’ और ‘सेब’ के पौधों पर फूल आ रहे हैं तो कभी राजस्थान जैसे क्षेत्र में बाढ़ और चेरापूंजी में सामान्य से कम मात्रा में वर्षा हो रही है। वैश्विक स्तर पर देखें तो ‘ग्लोबल वार्मिंग’, ओज़ोन-परत का क्षय होना तथा महासागर के स्तर में लगातार वृद्धि; जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ भी इससे बहुत प्रभावित हुई हैं।
वैसाखी या विशु उत्तर भारत में मनाया जाने वाला त्यौहार है, जिसे वसंत ऋतु के फसल उत्सव के रूप में देखा जाता है। इसके मनाने का उद्देश्य फसल को सफलतापूर्वक प्राप्त करना है, परंतु आजकल ऋतु चक्र में अनियमित परिवर्तन होने के कारण इस समय तक फसल कटाई हेतु तैयार भी नहीं हो पाती। जलवायु परिवर्तन का अन्य उदाहरण चंबा में होने वाले मिंजर मेले से लिया जा सकता है, जिसमें मक्की की बाली (मिंजर) को भगवान रघुनाथ को अर्पित किया जाता है। मौसम में आए बदलाव के कारण उस समय तक कुछ ही स्थानों पर मक्की की फसल में मिंजर विकसित हो पाती है, जबकि अधिकतर स्थानों में मिंजर तब निकलता है, जब मेले को समाप्त हुए कई दिन बीत चुके होते हैं। काफल हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक औषधीय फल है। कुमाऊँनी संस्कृति में इसका बहुत महत्त्व है। अक्सर वहां के गीतों में इस फल का चौत (अप्रैल) में पक कर तैयार होना दर्शाया गया है, लेकिन असमय ही पकने के कारण हमारी संस्कृति के प्रति संदेह डालते हुए ये उसकी प्रामाणिकता को प्रभावित करता है। जिसका कारण कहीं न-कहीं जलवायु परिवर्तन ही है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी भी क्षेत्र की संस्कृति, परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज उस स्थान की जीवंतता का प्रमाण होते हैं। ये मनुष्य के साथ संवेदनात्मक रूप से जुड़ी हैं। अतः पर्यावरण में आए बदलाव से उस स्थान की संवेदनाओं के आहत होने की सम्भावना बढ़ जाती है। जिसे इस शोध-पत्र के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया जाएगा।
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Pages:121-124
How to cite this article:
शिवम
"जलवायु परिवर्तन का सांस्कृतिक प्रथाओं पर प्रभाव". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 121-124
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