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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
जीवन यथार्थ का दस्तावेजः जूठन
Authors
डॉ॰ नरेश कुमार
Abstract
मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में उसके सामाजिक परिवेश का महत्वपूर्ण स्थान होता है। भारतीय समाज प्राचीनकाल से ही वर्ण और जात-पात व्यवस्था पर आधारित रहा है। भारतीय समाज में सदा से दलित वर्ग के साथ अमानुषिक और भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित जूठन आत्मकथा दलित लोगों के जीवन का यथार्थ दस्तोवज़ है। लेखक ने दिखाया है कि आज समाज, शिक्षा, राजनीति, साहित्य, संस्कृति और धार्मिक हर क्षेत्र में दलितों के साथ अन्याय और अत्याचार हो रहा है। जूठन के माध्यम से लेखक स्पष्ट करना चाहता हैै कि वास्तव में व्यक्ति की पहचान उसके गुणों के आधार पर होनी चाहिए न कि उसकी जाति के आधार पर। जूठन आत्मकथा व्यक्ति को जीवन में संघर्षरत रहते हुए संगठित और शिक्षित होने का संदेश देती है।
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Pages:117-120
How to cite this article:
डॉ॰ नरेश कुमार "जीवन यथार्थ का दस्तावेजः जूठन". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 117-120
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