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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
रामदरश मिश्र के काव्य में प्रेम और करुणा
Authors
डॉ. शशिकांत मिश्र, अंशु कुमारी
Abstract
नैसर्गिक सृष्टि का मूल तत्व और कुछ नहीं बल्कि प्रेम ही है और यह प्रेम अनिर्वचनीय है. इसीलिए तो महर्षि नारद को कहना पड़ा था ‘अनिर्वचनीय प्रेम स्वरूपम’, अर्थात प्रेम शब्दातीत है एवं अपरिभाषित है. इस नैसर्गिक प्रेम के प्रत्येक पक्ष में हमेशा नवीनता झलकती है, जिससे कि समस्त सृष्टि सदैव गत्यात्मक बनी रहती है। वास्तव में प्रेम ही जीवन है। प्रेम जब सांसारिक मोहमाया को त्याग कर लौकिक से पारलौकिक की ओर परिणति पाता है तब हम उसे भक्ति कहते हैं और भक्ति तो इस सृष्टि के नियंता ईष्वर की करुणा ही है. दूसरी ओर प्रेम व्यक्तिगत भी हो सकता है, मगर करुणा व्यष्टि से समष्टि की परिचायक है। करुणा समस्त चराचर को सम्यक दृष्टि से देखती है। साहित्य यदि समाज यां जनता की चित्तवृति का संचित प्रतिबिम्ब है तो प्रेम और करुणा उस जनता की चित्तवृति का सबसे मूल्यवान आधार स्तंभ है. यही प्रेम और करुणा ही व्यक्ति को संवेदनशील बनाती है।
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Pages:152-154
How to cite this article:
डॉ. शशिकांत मिश्र, अंशु कुमारी
"रामदरश मिश्र के काव्य में प्रेम और करुणा". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 152-154
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