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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
भारतीय दर्शनों में कर्म का सिद्धांत
Authors
विक्रान्त कौशिक, धर्मवीर शर्मा
Abstract
भारतीय दर्शन परम्परा में कर्म का महत्व पुराना है । मीमांसक भी कर्मवाद को विकृत करते हैं, लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म-योग मीमांसकों से अलग है । श्रीमद्भगवद्गीता सांसारिक कर्तव्यों को समझकर निष्काम-बुद्धि से उनके पालन पर बल देती है, लेकिन मीमांसक याज्ञिक कर्म-काण्ड को महत्व देते हैं । श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग में निःस्वार्थता तथा अनासक्ति का भाव है, जबकि कर्मवाद में स्वर्ग तथा आसक्ति की भावना प्रबल है । श्रीकृष्ण ने कहा कि जो सब भूत है और जगत को बनाया है, वह अपने कर्मों से पूजा जाता है, न कि पत्तों, फूलों या वाणी से कहने से मनुष्य सिद्धि पाता है । श्रीमद्भगवद्गीता ने संसार के अपने कर्तव्यों पर डटकर खड़े रहने का उपदेश नहीं दिया है और न ही सांसारिक कर्तव्यों से भागने का । वह लोगों को लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि के अलावा केवल कार्य करने का सिखाती है । यह कहना कि भगवान अपने स्वयं के कर्मों से संसारी लोगों को कर्म करने की शिक्षा देता है, यह कर्मयोग का सिद्धांत है । श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, "हे पार्थ, मैं इस जगत में कुछ भी नहीं कर सकता, लेकिन मैं भी कर्म करता हूँ ।
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Pages:60-64
How to cite this article:
विक्रान्त कौशिक, धर्मवीर शर्मा "भारतीय दर्शनों में कर्म का सिद्धांत". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 60-64
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