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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
अथर्ववेद में योगांगों का स्वरूप: यम-नियम के विशेष संदर्भ में
Authors
पारुल सैनी, डॉ बबलू वेदालंकार
Abstract

वैदिक साहित्य मानव सभ्यता के नैतिक, आचारिक एवं आध्यात्मिक जीवन के मूल तत्वों का स्रोत है, जिसमें यम-नियम को एक विशेष स्थान प्राप्त है। अथर्ववेद समेत अन्य वेदों में संयम, सत्य, अहिंसा, आंतरिक शुद्धता जैसे जीवनचर्या के अनुशासन की नींव रखी गई है, जो कालक्रम में पातंजलि के योगसूत्र में एक सुव्यवस्थित रूप में विकसित हुई। पातंजलि योगदर्शन में यम एवं नियम को योग साधना की आधारशिला माना गया है, जो न केवल व्यक्तिगत विकास बल्कि सामाजिक समरसता एवं वैश्विक मानवता के सूत्र भी प्रदान करता है।

यम योगदर्शन में अष्टांग योग का प्रथम अंग हैं, जिसका उद्देश्य सामाजिक आचरण का शुद्धिकरण है। यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पाँच नैतिक नियम होते हैं, जो मनुष्य को आदर्श जीवन की ओर प्रेरित करते हैं। नियम, जो योगदर्शन का दूसरा अंग है, आत्म-संयम, आंतरिक शुद्धता और आत्म-विकास का हेतु रखता है। इसके पाँच अंग - शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, व्यक्तिगत स्तर पर अनुशासन और सकारात्मकता विकसित करते हैं। मुंडकोपनिषद् में यम के रूप में विविध देवताओं, साध्य गणों और नैतिक मूल्यों को माना गया है, वहीं जैन दर्शन में पंचमहाव्रत के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। अथर्ववेद में योग का मुख्य स्वरूप चित्त-वृत्तिनिरोध और ब्रह्म प्राप्ति के लिए आंतरिक एकाग्रता के रूप में प्रस्तुत है, जिसमें आठ प्रकार के योग और ब्राह्मणों के छह कर्मों के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति की दिशा दिखाई गई है।

इस प्रकार यम-नियम से लेकर योग के अभ्यास तक की वैदिक परंपरा आध्यात्मिक प्रगति के लिए नैतिक और मानसिक अनुशासन की अनिवार्य प्रणाली प्रदान करती है।
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Pages:91-94
How to cite this article:
पारुल सैनी, डॉ बबलू वेदालंकार "अथर्ववेद में योगांगों का स्वरूप: यम-नियम के विशेष संदर्भ में". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 91-94
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