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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
संजीव के उपन्यास: आदिवासी जीवन, शोषण और प्रतिरोध
Authors
एम. शाबान खान
Abstract
हिंदी साहित्य में आदिवासी जीवन पर लेखन प्रेमचंद-पूर्व युग से ही प्रारंभ हो गया था। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संजीव ने अपने उपन्यासों ‘धार’, ‘पांव तले की दूब’ और ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ में आदिवासी जीवन, उनके शोषण, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ का सजीव चित्रण किया है। ‘धार’ उपन्यास संथाल आदिवासियों के पर्यावरणीय और सामाजिक शोषण को उजागर करता है, जहाँ मैंना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बनती है। ‘पांव तले की दूब’ भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और आदिवासियों के दमन की कथा है, जिसमें सुदीप्त जैसे पात्र आदिवासियों के पक्ष में संघर्ष करते हुए व्यवस्था से हताश हो जाते हैं। ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ थारू जनजाति के शोषण, राजनीति के अपराधीकरण और स्त्री उत्पीड़न को प्रस्तुत करता है। इन उपन्यासों में पूँजीपति, धर्म और प्रशासन द्वारा आदिवासियों के दमन के साथ-साथ उनके प्रतिरोध और चेतना के उदय को भी दर्शाया गया है। संजीव के ये उपन्यास केवल आदिवासी जीवन की पीड़ा नहीं बल्कि उनके संघर्ष और अस्तित्व की गाथाएँ हैं, जो यथार्थ और संवेदना से ओत-प्रोत होकर सामूहिक चेतना के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
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Pages:135-137
How to cite this article:
एम. शाबान खान "संजीव के उपन्यास: आदिवासी जीवन, शोषण और प्रतिरोध". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 135-137
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