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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
काव्य भाषा टूल; एवं मुक्तिबोध की कविता
Authors
लक्ष्य सिंह चौधरी
Abstract
भाषा जब साहित्यिक परिवर्तन के अनुरूप परिनिष्ठित और मानक रूप ग्रहण कर लेती है तब वह काव्य भाषा कहलाती है। भाषा शब्दों की साधक होती है क्योंकि शब्दों के द्वारा ही भाषा का निर्माण होता है। कवि अज्ञेय के अनुसार- "मेरी खोज भाषा की नहीं शब्दों की है।"[१]
मुक्तिबोध की काव्यभाषा का समय मुख्य रूप से नई कविता तथा प्रयोगवाद के मध्य का समय है जिस समय भाषाई विविधता अपने चरमोत्कर्ष पर थी इसलिए मुक्तिबोध की काव्य भाषा का परिमार्जित समय 1950 से 1960 के बीच का है। मुक्तिबोध के काव्य की भाषा की पहचान उनके अनूठे प्रतीक जैसे बरगद, सांझ, लाल पदार्थ, गुफा इत्यादि हैं तो दूसरी तरफ बिम्ब, अलंकार, मुहावरे, छंद विधान, फैंटसी एवं शब्दों का विविधतापूर्ण प्रयोग काव्य भाषा जगत में उनकी विशिष्ट पहचान अंकित कराती है।

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Pages:163-164
How to cite this article:
लक्ष्य सिंह चौधरी "काव्य भाषा टूल; एवं मुक्तिबोध की कविता". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 163-164
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