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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य
Authors
डॉ. पूनम कुमारी
Abstract
समकालीन हिंदी कविता आधुनिक हिंदी साहित्य की वह जीवंत धारा है, जो अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ निरंतर संवाद करती रही है । सामान्यतः 1970 अथवा 1975 के बाद की कविता को ‘समकालीन’ कहा जाता है, किंतु यह पद केवल काल-सूचक न होकर एक जटिल साहित्यिक-सांस्कृतिक अवधारणा के रूप में सामने आता है । समकालीनता किसी निश्चित तिथि, प्रवृत्ति या शैली में सीमित नहीं की जा सकती, बल्कि यह रचनाकार की समय-सापेक्ष संवेदनशीलता, वैचारिक सजगता और रचनात्मक हस्तक्षेप से अर्जित होती है । यह लेख समकालीन हिंदी कविता की अवधारणा, उसके ऐतिहासिक विकास, वैचारिक आधारों तथा आलोचनात्मक विवादों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है । इसमें 1970 के बाद उभरी जनवादी–प्रगतिशील चेतना, 1990 के बाद की बदलती सामाजिक संरचनाओं तथा 2000 के बाद सामने आई नई कवि-पीढ़ी की रचनात्मक प्रवृत्तियों पर विशेष ध्यान दिया गया है । लेख यह भी रेखांकित करता है कि समकालीन कविता केवल प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रतिरोध तक सीमित नहीं, बल्कि वह भाषा, शिल्प, लोक-संवेदना और निजी अनुभवों के माध्यम से भी अपने समय की जटिल सच्चाइयों को अभिव्यक्त करती है । इस प्रकार समकालीन हिंदी कविता वर्तमान का आलोचनात्मक दस्तावेज़ होने के साथ-साथ भविष्य की सांस्कृतिक संभावनाओं की ओर संकेत करने वाली सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में उभरती है ।
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Pages:204-207
How to cite this article:
डॉ. पूनम कुमारी "समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 204-207
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