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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
वैदिक कालीन जीवन-पद्धति और पर्यावरणीय संतुलन सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयाम
Authors
बेअन्त कौर, डॉ. सुनीता स्वामी
Abstract
वैदिक कालीन जीवन-पद्धति प्रकृति के साथ संतुलित सहअस्तित्व पर आधारित थी, जिसमें सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक मान्यताएँ, धार्मिक आचार और आर्थिक गतिविधियाँ पर्यावरणीय संवेदनशीलता से जुड़ी हुई थीं। पृथ्वी को माता, जल को जीवन, वायु को प्राण तथा अग्नि को ऊर्जा के रूप में स्वीकार कर वैदिक समाज ने प्रकृति के प्रति श्रद्धा, संयम और उत्तरदायित्व का भाव विकसित किया। आश्रम व्यवस्था, यज्ञ परंपरा, वन-संस्कृति, कृषि एवं पशुपालन, जल-संरक्षण और औषधि-संवर्धन जैसी व्यवस्थाएँ पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के साधन थीं। ‘ऋत’ और ‘धर्म’ की अवधारणाएँ ब्रह्मांडीय व्यवस्था और नैतिक अनुशासन को जोड़ती थीं, जिससे मानव-जीवन प्राकृतिक चक्रों के अनुरूप संचालित होता था। यह लेख वैदिक कालीन जीवन-पद्धति के सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयामों का विश्लेषण करते हुए प्रतिपादित करता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन में निहित पर्यावरण-दृष्टि आज के वैश्विक पर्यावरण संकट के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।
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Pages:217-218
How to cite this article:
बेअन्त कौर, डॉ. सुनीता स्वामी "वैदिक कालीन जीवन-पद्धति और पर्यावरणीय संतुलन सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयाम". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 217-218
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