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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
हानूश और कोणार्कः कलाकार, कृति और विनाश-बोध का तुलनात्मक अध्ययन
Authors
सुरभि श्रीवास्तव
Abstract
भारतीय हिन्दी नाट्य-साहित्य में कलाकार और उसकी कृति के संबंध को लेकर गहन वैचारिक द्वंद्व देखने को मिलता है। प्रस्तुत शोध में भीष्म साहनी के नाटक ‘हानूश’ तथा जगदीश चंद्र माथुर के ‘कोणार्क’ का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य कलाकार और उसकी कृति के संबंध, सत्ता के प्रभाव तथा सृजन और विनाश-बोध की समस्या का विश्लेषण करना है। शोध से यह स्पष्ट होता है कि दोनों नाटकों में कलाकार की स्थिति अत्यंत जटिल और संघर्षपूर्ण है। ‘हानूश’ में कलाकार अपनी कृति को अमर मानते हुए उसके संरक्षण के लिए संघर्ष करता है और अपने व्यक्तिगत कष्टों की परवाह नहीं करता। वह अपनी कला के प्रति पूर्णतः समर्पित है और अंततः स्वयं पीड़ित होकर भी अपनी कृति को सुरक्षित रखता है। इसके विपरीत, ‘कोणार्क’ में विशु परिस्थितियों, सत्ता के दबाव और आंतरिक द्वंद्व के कारण अपनी ही कृति के प्रति मोहभंग का अनुभव करता है और उसका विनाश कर देता है। अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि दोनों नाटकों में सत्ता का स्वरूप दमनकारी है, जो कलाकार की स्वतंत्रता को बाधित करता है। किन्तु कलाकार की प्रतिक्रिया भिन्न है, एक ओर हानूश प्रतिरोध और त्याग का मार्ग अपनाता है, वहीं दूसरी ओर विशु निराशा और आत्म-विनाश की ओर अग्रसर होता है। अंततः यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ‘हानूश’ कला की अमरता, आदर्शवाद और समर्पण का प्रतीक है, जबकि ‘कोणार्क’ यथार्थवाद, अस्तित्वगत संकट और सृजन के विनाश-बोध को अभिव्यक्त करता है। दोनों नाटक मिलकर कलाकार के जीवन के द्वंद्व, उसकी संवेदनाओं और उसकी सीमाओं का व्यापक चित्र प्रस्तुत करते हैं।
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Pages:5-7
How to cite this article:
सुरभि श्रीवास्तव "हानूश और कोणार्कः कलाकार, कृति और विनाश-बोध का तुलनात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 5-7
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