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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
व्यक्तिवाद और सामाजिक द्वंद्व : एक अध्ययन
Authors
दिवाकर कुमार
Abstract
यह शोध पत्र प्रमुख आधुनिक ‘व्यक्तिवादी’ रचनाओं में, व्यक्त ‘व्यक्तिवाद’ के उदय से उपजी सामाजिक द्वंद्व का अध्ययन करती है। कबीर के ‘व्यक्तिवाद’ से अलग, पाश्चात्य ‘व्यक्तिवाद’ का प्रचलन भारत के समाज में दिखता है। इसके प्रमुख कारणों में लेखक पर पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव तथा भारत में तकनीक का आगमन है। भारत के समाज में पाश्चात्य ‘व्यक्तिवाद’ के बढ़ने से समाज में किस-किस तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं, इसका अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन के लिए प्रमुखतः उन कवियों की कविताओं को आधार बनाया गया है जिनमें व्यक्तिवाद और सामाजिक द्वंद्व दिखता है। यह शोध पत्र अज्ञेय की रचनाओं से शुरू करते हुए भगवत अनमोल जैसे लेखकों के साहित्य के अध्ययन पर आधारित है। अज्ञेय के साहित्य में जहां मनोविश्लेषणवादी ‘व्यक्तिवाद’ है, वही भगवान अनमोल के साहित्य में यथार्थ ‘व्यक्तिवाद’ है। क्योंकि आज समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव के कारण सामाजिक मूल्यों को मानने वालों और पालन करवाने वालों का, नई विचारधारा से द्वंद्व उत्पन्न होना स्वाभाविक है। भारत एक विविध देश है और यहां व्यक्तिवाद, में भी विभिन्नता देखी जाती है। अतः इस शोध पत्र में साहित्यिक आधार के साथ-साथ कुछ समाचार पत्रों के खबरों का भी इस्तेमाल किया गया है, इससे जो छूटे हुए व्यक्तिवादी पहलू हैं, उन्हें भी इस शोध पत्र में शामिल करने का प्रयास किया गया है।
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Pages:95-98
How to cite this article:
दिवाकर कुमार "व्यक्तिवाद और सामाजिक द्वंद्व : एक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 95-98
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