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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
डॉ. भारिल्ल का साहित्य और गांधीगिरि
Authors
डॉ. मनीष कुमार जैन
Abstract
“डॉ. भारिल्ल और गांधीगिरि” डॉ. भारिल्ल के व्यक्तित्व और उनकी कार्यशैली पर महात्मा गांधी के प्रभाव का अत्यंत मौलिक और विचारोत्तेजक है। सामान्यतः डॉ. भारिल्ल को एक आध्यात्मिक मनीषी और कानजी स्वामी के सिद्धांतों के व्याख्याता के रूप में देखा जाता है, परंतु आपने उनके ‘साधन की पवित्रता’ वाले पक्ष को गांधीजी के सत्याग्रह से जोड़कर एक नया आयाम प्रस्तुत किया है।
गांधीजी की तरह डॉ. भारिल्ल का भी यह अटूट विश्वास रहा है कि यदि हमारा साध्य महान है, तो उसे प्राप्त करने का साधन भी उतना ही पवित्र होना चाहिए। आपने सही रेखांकित किया है कि उन्होंने विरोधियों को नहीं, बल्कि विरोध (अज्ञान) को समाप्त करने पर बल दिया। उनका यह कहना कि “हमें तो गोली का जवाब गाली से भी नहीं देना है” गांधीवादी अहिंसा का आध्यात्मिक संस्करण है।
अक्सर धार्मिक संस्थाओं में संगठन को बचाने के लिए सत्य से समझौते कर लिए जाते हैं] लेकिन डॉ. भारिल्ल की स्पष्ट नीति रही है कि सत्य की कीमत पर संगठन नहीं और संगठन की कीमत पर सत्य नहीं। यह निर्भीकता उन्हें गांधीजी के उस सत्य के प्रयोग के करीब खड़ा करती है जहाँ सत्य ही ईश्वर है।
नागपुर (1987) के प्रसंग में उन्होंने जिस तरह पीली पट्टी बाँधने] सामूहिक उपवास और प्रार्थना सभाओं की रूपरेखा तैयार की, वह पूरी तरह से गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की याद दिलाती है। यहाँ पीली पट्टी शांति और विरोध का अद्भुत समन्वय थी] जो बिना किसी हिंसा के अपनी बात दृढ़ता से रखने का माध्यम बनी।
डॉ. भारिल्ल ने उनका मानना है कि किसी को दबाकर या हराकर प्राप्त की गई विजय वास्तविक नहीं है] सच्ची विजय वह है जहाँ विरोधी का हृदय परिवर्तित होकर सत्य के प्रति समर्पित हो जाए।
लेख में यह तुलना बहुत सटीक है कि जिस तरह गांधीजी को अंग्रेजों और अपनों दोनों से लड़ना पड़ा] वैसे ही डॉ. भारिल्ल को भी बाहरी विरोधियों और अपने ही समूह के उन लोगों से जूझना पड़ा जो उनकी समन्वयकारी और शांतिपूर्ण नीति को शिथिलता या कायरता समझते थे।
लेख यह सिद्ध करता है कि डॉ. भारिल्ल केवल शब्दों के जादूगर नहीं, बल्कि क्रियात्मक अध्यात्म के संवाहक थे। उन्होंने सिद्ध किया कि जैन धर्म का अनेकांत और अहिंसा केवल शास्त्रों की वस्तु नहीं है, बल्कि इन्हें आधुनिक सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों में हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

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Pages:116-119
How to cite this article:
डॉ. मनीष कुमार जैन "डॉ. भारिल्ल का साहित्य और गांधीगिरि". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 116-119
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