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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
बौद्ध दर्शन में नारी की स्थिति: एक आलोचनात्मक विमर्श
Authors
दमयंती बाई
Abstract
यह लेख तथागत बुद्ध के स्त्री संबंधी दृष्टिकोण को विश्लेषित करता है, जो आरम्भ में नकारात्मक था, लेकिन आनन्द के आग्रह और समयानुसार उसमें सकारात्मकता की ओर बढ़ा। इस लेख के माध्यम से बुद्ध की जातक कथाएँ, थेरीगाथाएँ, त्रिपिटक और अन्य बौद्ध साहित्य में स्थित स्त्री सम्बंधित विचारों का गहन मूल्यांकन किया गया है। बुद्ध का प्रारम्भिक स्त्री दृष्टिकोण काफ़ी नकारात्मक था, वे स्त्री को संघ में प्रवेश देने के पक्षधर नहीं थे। स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने के लिए आठ नियम बनाये गये, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को पुरुषों के समान स्वतन्त्रता संघ में भी नहीं थी। थेरीगाथा नारी मुक्ति के आंदोलन और स्त्री विमर्श के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें स्त्रियों की अपनी अलग दुनिया है — उनके सुखों की अनुभूति है, दु:खों का गान है, पीड़ा है, मुक्ति की चाह है और मोक्ष प्राप्त करने की आकांक्षा है। बुद्ध ने स्त्री-हित में महत्वपूर्ण कार्य किए, लेकिन कहीं-कहीं उनके विचारों में द्वंद नज़र आता है। पूरी तरह बुद्ध भी पितृसत्ता विचारों से उभर नहीं पाए। बुद्धकाल से शुरू हुआ स्त्री संघर्ष की प्रतिध्वनि वर्तमान समय में भी सुनाई देती है।
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Pages:212-215
How to cite this article:
दमयंती बाई "बौद्ध दर्शन में नारी की स्थिति: एक आलोचनात्मक विमर्श ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 212-215
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