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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
भिखारी ठाकुर के नाटकों में जाति व्यवस्था एवं सामाजिक स्तर का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
Authors
अमृता कुमारी, कपिल देव कुमार पासवान
Abstract
भिखारी ठाकुर हिंदी एवं भोजपुरी लोकनाट्य परंपरा के प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं, जिनके नाटकों में भारतीय समाज की यथार्थपरक झलक मिलती है। उनके नाटकों में जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता, वर्गीय विभाजन तथा लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को गहराई से प्रस्तुत किया गया है। यह शोध-पत्र भिखारी ठाकुर के प्रमुख नाटकों जैसे-’’बिदेसिया’’, ’’गबरघिचोर’’, ’’बेटी बेचवा’’ के माध्यम से जाति व्यवस्था एवं सामाजिक स्तर के स्वरूप का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करता है। अध्ययन में यह पाया गया कि ठाकुर के नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और परिवर्तन का सशक्त उपकरण हैं।
भिखारी ठाकुर के नाटकों में सामाजिक चेतना का निर्माण केवल कथानक या संवादों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि लोकभाषा, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रतीकों के जरिए भी होता है। उनकी भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की बोली से जुड़ी हुई है, जिससे आम जनता आसानी से उनके संदेश को समझ पाती है। ’’बिदेसिया’’ जैसे नाटकों में प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा और पारिवारिक विघटन का चित्रण दर्शकों को अपनी ही सामाजिक परिस्थितियों का बोध कराता है। इस प्रकार, उनके नाटक सामाजिक यथार्थ को उजागर कर लोगों में जागरूकता उत्पन्न करते हैं।
इसके अतिरिक्त, भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना को भी प्रोत्साहित किया। ’’बेटी बेचवा’’ में बाल-विवाह और दहेज प्रथा जैसे मुद्दों को उजागर करते हुए उन्होंने समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। उनके पात्र केवल पीड़ित नहीं होते, बल्कि कई बार वे अपने अधिकारों के प्रति सजग होकर अन्याय के विरुद्ध आवाज भी उठाते हैं। यह प्रवृत्ति सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम को दर्शाती है।
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Pages:47-51
How to cite this article:
अमृता कुमारी, कपिल देव कुमार पासवान "भिखारी ठाकुर के नाटकों में जाति व्यवस्था एवं सामाजिक स्तर का समाजशास्त्रीय विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 47-51
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