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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
प्रतिभा राय के ‘परिचय’ और ‘शिलापद्म उपन्यास में नारी यथार्थता
Authors
अलकाराणी त्रिपाठी
Abstract
शिव के अर्धनारीश्वर रूप के स्वरूप नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं । उत्सर्ग भाव का प्राधान्य ही नारी स्वरूप है परंतु जब बात उसके स्वाभिमान की हो वह चंडी स्वरूपा भी बन सकती है। जिस प्रकार अपने प्रिय जनों के लिए उत्सर्ग भावना उसका स्वाभाविक गुण है उसी प्रकार अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए खड्ग धारण भी उसका स्वाभाविक गुण है। इन्हीं गुणों का सफल चित्रायन प्रतिभा राय ने अपने प्रारंभिक रचना ‘परिचय’ तथा ओड़िशा के स्थापत्य कला को समर्पित रचना ‘शीलापदम’ में किया है । ‘परिचय’ में जंगल की अबोध किशोरी भावावेग के वश में शहर के अनजान ‘बाबू’ के सामने स्वयं को समर्पित कर देती है, तथा माता, पत्नी, पुत्री के रूप में अपने परिवार की सुरक्षा के लिए घृणित कार्य तक करने के लिए कुंठा बोध नहीं करती परंतु अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए उसी ‘बाबू’ के सामने चंडी रूप धारण कर लेती है । ‘शिलापद्म’ की पढ़ी-लिखी शोधार्थी स्वच्छंद होते हुए भी स्व-संस्कारों में बंधी है तथा मंदिर निर्माण में व्यस्त अपने प्रिय के प्रतीक्षा में ‘शिल्पीप्रिया’ उस समय के नारी जीवन की दयनीयता का प्रतिनिधित्व करती है । नारी सर्वसंहा तब तक है जब तक उसका सम्मान है जब उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचे वह विद्रोहिणी बन जाती है ।
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Pages:28-32
How to cite this article:
अलकाराणी त्रिपाठी "प्रतिभा राय के ‘परिचय’ और ‘शिलापद्म उपन्यास में नारी यथार्थता". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 28-32
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