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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
निर्मला: महिला सशक्तिकरण, समकालीन नारीवादी विमर्श एवं सामाजिक न्याय
Authors
डॉ. सी. मोहना
Abstract
मुंशी प्रेमचंद का निर्मला (1927) हिन्दी साहित्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामाजिक-यथार्थवादी उपन्यास है, जिसमें भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना, दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, स्त्री की अस्मिता, पारिवारिक अविश्वास तथा सामाजिक नैतिकता की जटिलताओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। यह उपन्यास केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत त्रासदी का आख्यान नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का गहन विश्लेषण भी है, जिसमें स्त्री का जीवन परिवार, परम्परा और पुरुष-प्रधान सत्ता के बीच निरंतर नियंत्रित होता रहता है।
प्रेमचंद ने निर्मला के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि स्त्री के जीवन की अधिकांश समस्याएँ उसकी व्यक्तिगत दुर्बलता से उत्पन्न नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक कुरीतियों और असमान शक्ति-संबंधों का परिणाम हैं। विशेषतः दहेज-प्रथा और अनमेल विवाह को उन्होंने स्त्री-असमानता की केंद्रीय सामाजिक समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किया। आधुनिक नारीवादी दृष्टि से देखा जाए तो निर्मला भारतीय समाज में स्त्री के संरचनात्मक शोषण का प्रारम्भिक समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है।
यह उपन्यास प्रेमचंद के साहित्यिक विकास का भी एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। सेवासदन में जहाँ उन्होंने वेश्यावृत्ति और स्त्री-पुनर्वास की समस्या को उठाया था, वहीं निर्मला में वे घरेलू जीवन, विवाह संस्था, दहेज और पारिवारिक सत्ता-संबंधों के भीतर स्त्री के मानसिक और सामाजिक संघर्ष का गहन विश्लेषण करते हैं। इस दृष्टि से निर्मला हिन्दी उपन्यास परंपरा में स्त्री-विमर्श का एक निर्णायक पाठ है।
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Pages:43-46
How to cite this article:
डॉ. सी. मोहना "निर्मला: महिला सशक्तिकरण, समकालीन नारीवादी विमर्श एवं सामाजिक न्याय". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 43-46
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