Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
श्रीअयोध्या की बहु-सांस्कृतिक विरासत : अयोध्या की परंपराओं का एक ऐतिहासिक अनुशीलन
Authors
सच्चिदानंद तिवारी , प्रकाश तिवारी
Abstract
अयोध्या सनातन धर्म, आस्था और भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का पावन केंद्र है। वेदों में इसे देवताओं की पुरी और पुराणों में विष्णु की प्रथम पुरी माना गया है। सरयू नदी के तट पर बसी यह पावन नगरी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि होने के साथ-साथ मनु, इक्ष्वाकु, भगीरथ और रघु जैसे पौराणिक महान शासकों की कर्मभूमि रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने सन १५७४ ईस्वी में रामनवमी के दिन यहीं से कालजयी महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' की रचना आरम्भ की थी।
अयोध्या केवल हिंदू धर्म तक सीमित न होकर बहुसांस्कृतिक विरासत और सर्वधर्म समभाव की अनुपम प्रतीक है। यह नगरी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव सहित पाँच तीर्थंकरों की पावन जन्मभूमि है। यहाँ महात्मा बुद्ध ने वर्षावास किया तथा सिख धर्म के प्रथम एवं अंतिम गुरुओं ने प्रवास कर मानवता का संदेश दिया। इसके साथ ही शीश पैगंबर और हज़रत बड़ी बुआ साहिबा की दरगाहें यहाँ की साझा सामासिक संस्कृति और धार्मिक सौहार्द को सुदृढ़ करती हैं।
नगरी के मध्य स्थित 'कनक भवन' श्रीराम और माता सीता का दिव्य लीला-निकेतन एवं रसिकोपासना का मुख्य केंद्र है, जिसका भव्य निर्माण ओरछा की महारानी वृषभानु कुँवरि ने कराया था। अयोध्या का शास्त्रीय व लोक संगीत, अष्टयाम सेवा, रामलीला, पद-गायन तथा कार्तिक एवं रामनवमी के विशाल मेले यहाँ की जीवंत परंपरा को प्रदर्शित करते हैं। संक्षेप में, अयोध्या सर्वसमावेशी चरित्र, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय रागात्मक चेतना का स्वर्णिम प्रतीक है।

Download
Pages:77-81
How to cite this article:
सच्चिदानंद तिवारी , प्रकाश तिवारी "श्रीअयोध्या की बहु-सांस्कृतिक विरासत : अयोध्या की परंपराओं का एक ऐतिहासिक अनुशीलन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 77-81

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.