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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
माता अमृता देवी बिश्नोईः नारी शक्ति, त्याग और प्रकृति प्रेम
Authors
किरण
Abstract
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को कभी भी मात्र एक भौतिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवन, सह -अस्तित्व एवं मानवीय संवेदनाओं की आधारशिला के रूप में देखा गया है। जल, वृक्ष, वन्यजीव तथा संपूर्ण जैव -जगत भारतीय लोक- चेतना और भारतीय संत परंपरा में सदैव करुणा और संरक्षण का केंद्र बिंदु रहे हैं। इसी विशुद्ध प्रकृति दृष्टि के आलोक में गुरु जंभेश्वर जी द्वारा स्थापित 29 नियमों बिश्नोई समाज की पारिस्थितिकीय-संरक्षण परंपरा का विशिष्ट स्थान है। इस परंपरा का सर्वाधिक मार्मिक ऐतिहासिक मिसाल सन् 1730 का खेजड़ली बलिदान है, जहां माता अमृता देवी बिश्नोई ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके इस कदम का अनुसरण करते हुए उनकी तीन बेटियों सहित बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपना आत्म बलिदान दिया। यह प्रसंग स्त्री-शक्ति, त्याग, साहस, सामूहिक एकता तथा प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम का एक दुर्लभ दृष्टांत है। इस शोध पत्र के माध्यम से माता अमृता देवी बिश्नोई के जीवन व कार्यों के माध्यम से नारी-शक्ति, आत्म बलिदान तथा पर्यावरण-प्रेम के अंतर संबंधों का गहन विश्लेषण करना है। इसमें यह विश्लेषित किया गया है कि किस तरह अमृता देवी का त्याग महज वृक्ष एवं जीव संरक्षण की सीमा लाँघकर मनुष्य और प्रकृति के नैतिक एवं सह-अस्तित्व संबंध का प्रतीक बनता है। खेजड़ली की इस घटना के परवर्ती काल में भारत में उपजे विभिन्न पर्यावरणीय चेतना के विभिन्न चरणों को समग्रता में समझा जा सकता है - जैसेः 1973 का “चिपको आंदोलन“, 1983 का “अप्पिको आंदोलन“ तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन, जैसे जन संघर्षों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को केंद्र में ला खड़ा किया। इस आंदोलन के संदर्भ में खेजड़ली की गाथा एक ठोस ऐतिहासिक नींव का निर्माण करती हैं। वर्तमान 21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन, वनोन्मूलन, जैव- विविधता की क्षति, जल-संकट, भूमि- क्षरण जैसी गंभीर समस्या मानवता के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ी है। इस परिप्रेक्ष्य में माता अमृता देवी का जीवन-चरित्र केवल एक ऐतिहासिक स्मृति न रहकर, आधुनिक युग के लिए, पर्यावरणीय संकट के लिए, एक जीवंत नैतिक संदेश के रूप में प्रासंगिक हो जाता है। इस दृष्टांत से यह सिद्ध होता है अमृता देवी जी का यह संघर्ष दर्शाता है - कि नारी न केवल परिवार और समाज की रक्षक है अपितु संपूर्ण सृष्टि और पर्यावरण की रक्षा में भी निर्णायक नेतृत्व क्षमता रखती है। अतः यह शोध अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान को पर्यावरणीय चेतना के परस्पर संबंधों में विश्लेषित करता है। त्याग में निहित साहस, नारी शक्ति में निहित नेतृत्व, भाव और प्रकृति प्रेम में निहित सह -अस्तित्व की भावना वर्तमान पर्यावरणीय संकट के संबंध में आज भी सार्थक है। इस दृष्टि से खेजड़ली का बलिदान भारतीय पर्यावरण संरक्षण का वह प्रेरणादायी अध्याय है जो अतीत से वर्तमान और भावी पीढ़ियों तक प्रकृति के प्रति मानवीय उत्तरदायित्व का अविरल प्रवाह बनाए रखने में आज भी पूर्णतः प्रासंगिक है।
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Pages:108-110
How to cite this article:
किरण "माता अमृता देवी बिश्नोईः नारी शक्ति, त्याग और प्रकृति प्रेम". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 108-110
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