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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
हिन्दी पत्रिकाओं में अनुवाद विमर्श: एक आलोचनात्मक अध्ययन
Authors
रुखसार आलम
Abstract
हिन्दी साहित्य में अनुवाद की उपस्थिति ऐतिहासिक रही है, किन्तु उसका वैचारिक विश्लेषण बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उभरकर सामने आता है। इसके मूल में हिन्दी पत्रिकाओं की भूमिका निर्णायक रही है। पत्रिकाओं ने अनुवाद को विमर्श के स्तर तक पहुँचाया। वर्तमान में, अनुवाद हिन्दी साहित्य में विमर्श की गंभीर भूमि है, जिसमें प्रतिरोध, बहुभाषिकता, लैंगिक न्याय, दलित विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक दृष्‍टि, और सांस्कृतिक सत्ता जैसे विषय शामिल हैं। इन सबके साथ-साथ सम्पादकीय दृष्‍टिकोण, अनुवाद चयन की रणनीति और अनुवाद की भाषिक-वैचारिक संरचना भी इस विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। 
इस शोधपत्र में हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं में अनुवाद विमर्श के विकास, प्रवृत्तियों और वैचारिक प्रभावों का आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। शोध का मूल उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं, जैसे हंस, तद्‍भव, समकालीन भारतीय साहित्य, अनुवाद, वागर्थ आदि ने अनुवाद को किस रूप में अपनाया, उसे किस रूप में प्रस्तुत किया और कैसे विकसित किया? क्या अनुवाद केवल भाषिक स्थानांतरण है या वह विचार और अस्मिता के विमर्श का भी हिस्सा बनता है? इस शोध में इन्हीं सवालों के जवाब पाने का प्रयास किया गया है।

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Pages:114-118
How to cite this article:
रुखसार आलम " हिन्दी पत्रिकाओं में अनुवाद विमर्श: एक आलोचनात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 114-118

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