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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
समकालीन हिंदी कविता: यथार्थ के नए आयाम, शिल्पगत विविधता और पत्रिकाओं का परिप्रेक्ष्य
Authors
डॉ. तरूण कुमार साहू
Abstract
इक्कीसवीं शताब्दी को ‘कथा का युग’ कहा जा रहा है। उपन्यास और कहानी के वर्चस्व के बावजूद कविता ने अपना स्थान न केवल बचाए रखा है, अपितु प्रत्येक कालखंड में अपने शिल्प और विषयवस्तु में निरंतर परिवर्तन भी किया है। इक्कीसवीं शताब्दी में विशेषकर चार-पंक्तीय लघु कविताओं की लोकप्रियता बढ़ी है। वहीं कॉपी-पेस्ट और सोशल मीडिया के युग में मौलिकता का संकट भी गहराया है। इस आलेख का उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि समकालीन हिंदी कविता किस प्रकार दरबारी स्तुति से हटकर जन-जीवन, संघर्ष और यथार्थ के धरातल पर खड़ी हो रही है। साथ ही _हंस, वागर्थ, आलोचना, कथादेश, वनमाली कथा_ जैसी पत्रिकाओं की भूमिका को रेखांकित करना है।
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Pages:111-113
How to cite this article:
डॉ. तरूण कुमार साहू "समकालीन हिंदी कविता: यथार्थ के नए आयाम, शिल्पगत विविधता और पत्रिकाओं का परिप्रेक्ष्य". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 111-113

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