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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
संत रज्जब के साहित्य में जाति और अहं का तिरोभाव : एक विश्लेषण
Authors
डॉ. रीना श्रीमाली
Abstract
भारतभूमि भक्ति के आधार पर विश्व के लिए प्रेरणादायी रही है। हमारे भारतीय जीवन मूल्यों पर विचार करे तो हम वसुधैव कुटुम्बकम, जियो और जीनें दो के भाव अनायास नहीं आए हैं। इन सबके पीछे भारत की संत परंपरा, शास्त्र संमत आध्यात्म रहा हैं। देश मे फेले अंधविश्वास, पाखंड व धार्मिक उन्माद को दबाने का सहारा भक्ति बनी। महान संत रामानंद व उनके शिष्यों ने भक्ति को दक्षिण से लगभग सम्पूर्ण भारत में आदोलन के रूप में खडा किया।
स्वर्णकाल भक्तिकाल को साहित्य में निर्गुण और सगुण काव्यधारा में बांटा गया है। निर्गुण काव्य को संत काव्य कहा गया। जिसके प्रतिनिधि कवि कबीर हैं। दादूदयाल, गुरुनानक, नामदेव, सुन्दरदास, रैदास, धन्ना, मीरा ने निर्गुण भक्ति से की रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड, धार्मिक विभेद को समाप्त कर देश में प्रभावशाली आंदोलन खडा किया। भक्तिकालीन संतों की ईश्वर व गुरु के प्रति अटूट आस्था व श्रद्धा थी। उनका ईश्वर अजन्मा, निराकार व अन्तर्यामी जो कण-कण में व्याप्त है।
जाके मुंह माथा नाहि, नाहि रुप कुरुप। पुहुप वास तै पातरा ऐसा तत अनूप। 1 
भक्तिकालीन संत साहित्य में अधिकतर संत कम पढे लिखे थे। कबीरदास की उक्ति श्मसि कागद छुआ नाहि, कलम गहि ना हाथ’ केवल कबीर के लिए नहीं अपितु लगभग सभी संतों के लिए प्रयुक्त हुई है। फिर भी संतों ने अपने अनुभव व साधना से समाज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं का निराकरण कर हमारे लिए समाज सुधारक सिद्ध हुए। लगभग सभी संतों ने कबीर के चिंतन व वाणी का अनुसरण करते हुए लिखा हैं। जिसमें दादूदयाल व उनके शिष्य प्रमुख है।

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Pages:176-178
How to cite this article:
डॉ. रीना श्रीमाली "संत रज्जब के साहित्य में जाति और अहं का तिरोभाव : एक विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 176-178

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