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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा - एक आलोचनात्मक दृष्टि
Authors
डॉ. जे सेन्दामरै
Abstract
आत्मकथा में रचनाकार का आत्मतत्व जितना गहन, विस्तीर्ण, रागपरक एवं क्रमबद्ध होता है,उतना और किसी विधा में नहीं। रचनात्मक आत्मालोचना का नाम ही आत्मकथा हैं। बच्चन की आत्मकथा ने हिन्दी आत्मकथा को अपनी एक विशिष्ट और निजी पहचान दी है,एक जनरूचिकर ग़द्य विधा के रूप उसे एक खास नया चेहरा दिया है। बच्चन की आत्मकथा श्रृंखला में इस दृष्टि से हिन्दी आत्मकथा का विश्वस्तरीय चरमोत्कर्ष परिलक्षित होता है। आत्मकथा को पढने से ऐसा लगता है कि राष्ट्रीयता के नाम पर उनमें एकदम जोश उत्पन्न होता है। हिन्दी साहित्य के प्रति उनका योगदान हमेशा अतुलनीय रहेगा।
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Pages:173-175
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डॉ. जे सेन्दामरै "हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा - एक आलोचनात्मक दृष्टि". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 173-175

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हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा - एक आलोचनात्मक दृष्टि | International Journal of Hindi Research