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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
21वीं सदी की हिंदी महिला कहानीकारों की कहानियों में वृद्धावस्था की सामाजिक एवं पारिवारिक स्थितियों का चित्रण
Authors
सुनीता गोपालिया
Abstract
21वीं सदी के हिंदी कथा-साहित्य में वृद्धावस्था एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक और मानवीय प्रश्न के रूप में उभरती है। भूमंडलीकरण, शहरीकरण, आर्थिक उदारीकरण, एकल परिवारों का विस्तार, प्रवासन, उपभोक्तावादी जीवन-दृष्टि और बदलते पारिवारिक मूल्यों ने वृद्ध व्यक्ति की पारंपरिक सामाजिक स्थिति को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय परिवार-व्यवस्था में कभी अनुभव, परंपरा और निर्णय के केंद्र में रहने वाले वृद्ध आज अनेक परिस्थितियों में भावनात्मक उपेक्षा, अकेलेपन, आर्थिक असुरक्षा, पीढ़ियों के बीच दूरी तथा उपयोगितावादी दृष्टिकोण का सामना करते दिखाई देते हैं। समकालीन हिंदी महिला कहानीकारों ने वृद्धावस्था को केवल शारीरिक दुर्बलता या जीवन की अंतिम अवस्था के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे परिवार, समाज, लैंगिक संबंधों, आर्थिक संरचना और मानवीय गरिमा से जोड़कर प्रस्तुत किया है। मृदुला गर्ग की ‘बेंच पर बूढ़े’, सूर्यबाला की ‘बाऊजी और बंदर’, चित्रा मुद्गल की ‘गेंद’, मनीषा कुलश्रेष्ठ की ‘प्रेतकामना’, कृष्णा अग्निहोत्री की ‘मैं जिन्दा हूँ’ तथा उर्मिला शिरीष की वृद्ध-विमर्श से संबंधित कहानियों में वृद्ध जीवन की विविध स्थितियाँ सामने आती हैं। इन रचनाओं में वृद्ध पात्र कहीं परिवार के भीतर रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेले हैं, कहीं वृद्धाश्रम में विस्थापित जीवन जी रहे हैं, तो कहीं अपने ही घर में अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष करते हैं। महिला कहानीकारों की दृष्टि की विशेषता यह है कि वे वृद्धावस्था को करुणा के साथ-साथ सामाजिक आलोचना और आत्मसम्मान के प्रश्न से भी जोड़ती हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में इन्हीं सामाजिक एवं पारिवारिक स्थितियों का आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है।
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Pages:181-184
How to cite this article:
सुनीता गोपालिया "21वीं सदी की हिंदी महिला कहानीकारों की कहानियों में वृद्धावस्था की सामाजिक एवं पारिवारिक स्थितियों का चित्रण". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 181-184
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