Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 2, ISSUE 1 (2016)
समकालीन लंबी कहानी में स्त्री-विमर्श के विविध आयाम
Authors
डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
समकालीन कहानी अपने विकास के ऐसे अनेक उतार-चढ़ाव देखकर आई है। उसने हमेशा समय की आंच पर खुद को परखा भी है। अनेक दबावों तनावों और संघर्षों का सामना करते हुए उसने अपने विकास का यह पड़ाव पूरा कर लिया है। संघर्ष दबाव और तनाव आज भी कम नहीं हैं। जो कहानीकार इस दुर्द्धर्ष संघर्ष को झेल गए, उनकी कहानियां सामाजिक विकास की प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई और जिसने संघर्ष के समक्ष घुटने टेक परिस्थितियों से समझौता कर लिया उनकी कहानियां कमजोर, नकली और रहस्यमयी हो गई।”¹ इनकी पकड़ समकालीन यथार्थ पर ढीली पड़ गई। कला की बदसूरती अश्लीलता को जन्म देती है। कला में वीभत्स, असुन्दर और कुरूप का चित्रण सार्थक हो सकता है पर कला को ही वीभत्स, असुन्दर, कुरूप और अश्लील बना दिया जाए तो उचित नहीं है। नारीवादी कहानी लेखक और लेखिकाओं ने जहां हिन्दी कहानी को समृद्ध किया है वहीं स्त्री जीवन की त्रासदियों को लेकर जो क्षोभ और घृणा उनके भीतर पनपी है उसने यौन विच्युतियों को जन्म दिया है। कई बार ऐसा लगता है कि केवल यौन-सम्बन्धों की उन्मुक्तता और स्वच्छन्दता ही स्त्री की वास्तविक मुक्ति है। राजेन्द्र यादव, दूधनाथ सिंह, आबिद सुरति, मणिका मोहिनी, लवलीन, अखिलेश, महेन्द्र भल्ला, जयाजादवानी, मृदुला गर्ग जैसे अनेक कहानीकारों की कहानियों में यह संकेत मिलता है।
Download
Pages:65-68
How to cite this article:
डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "समकालीन लंबी कहानी में स्त्री-विमर्श के विविध आयाम". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 1, 2016, Pages 65-68
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.