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VOL. 3, ISSUE 2 (2017)
गीताः विषाद से क्रान्ति और क्रान्ति से सृजन
Authors
प्रो0 संगीता जैन, प्रो0 लक्ष्मी शर्मा
Abstract
विषाद से क्रान्ति और क्रंाति से सृजन सम्भव है। अर्जुन के विषाद से गीता का जन्म हुआ । महाभारत का सारा युद्ध अर्जुन के विषाद पर टिका है । धृतराष्ट्र और कौरवों की अनुचित कामनायें उनकी अनुचित वासनायों का परिणाम गीता है। अर्जुन का विषाद संताप से आत्मा-क्रान्ति की ओर ले जाता है। अपनो को मार कर कैसा सुख अर्जुन की बेचैनी के पीछे प्रामणिकता छिपी हैे। निष्काम कर्म और अखंड मन सृजनात्मक तक पहुंचाने का एक मार्ग है। फल, आकांक्षा रहित कर्म। अन्तःकरण की शुद्धि से विपेक्ष खो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध हो तो विपेक्ष अपने आप अलग हो जाते है। संसार कर्मक्षेत्र है जहां सदा महाभारत चलता रहता है। जिस प्राणी की होनहार बिगड़ चुकी हो - उस जीव को कोई भी नही समझा सकता । जैसे धृतराष्ट और कौरव। अर्जुन विचलित है - कृष्ण अर्जुन को विवेक से काम लेने की प्रेरणा देते है। अपने विचारों को सीढी बनाओ औेर विजयी भव। यह बुद्धिजीवियों का संकल्पवानों का युग है। अपने अंहकार को परमार्थ की ओर मोडना है तभी मनुष्य अपने आप को महा विषाद से बचाकर सृजनात्मकता का ओर ले जा सकेगा।
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Pages:06-08
How to cite this article:
प्रो0 संगीता जैन, प्रो0 लक्ष्मी शर्मा "गीताः विषाद से क्रान्ति और क्रान्ति से सृजन". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 2, 2017, Pages 06-08
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