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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
योग दर्शन में आत्मा का स्वरूपः एक दार्शनिक विवेचन
Authors
राकेश कवचे
Abstract
योग दर्शन में जड़ जगत् का उपादान कारण जड़ प्रकृति को स्वीकार किया गया है। इस अचेतन जगत् का कारण अचेतन प्रकृति है। योग दर्शन में प्रकृति के प्रधान गुणों में त्रिगुण, अलिंगन आदि को अपर नाम से जाना जाता है। इस प्रकार से योग दर्शन में इसका दूसरा नाम दृश्य जगत् भी है।1 इस तरह से दृश्य जगत् का प्रयोग वृद्धि के लिए भी होता रहा है। यही प्रकृति प्रदत्त वेदान्त आदि अन्य दर्शनों में माया, अविद्या, अणु आदि नामों से प्रमाण मिलता है।2 फिर भी यह प्रपंच पूर्ण अविद्या का कारण माना गया है। विशेष रूप से प्रकृति का कोई कारण नहीं होता है। योग दर्शन में विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को सभी मार्गों के अभ्यासों का वर्णन करना होता है। इस प्रकार से साधक को स्वयं के अन्तिम और मध्य के मार्ग को प्राप्त करना पड़ता है। एक साधक योग की क्रिया-विधि के द्वारा किसी साधना विधि का आत्मिक रूप से विवेचन प्रस्तुत करता है। इस प्रकार से समाज में योग की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। इस शोध पत्र में द्वितीय शोध सामाग्री के रूप में अध्ययन किया गया है। इसमें ज्ञानमीमांसीय दृष्टिकोण से अध्ययन का आधार बनाया गया है।
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Pages:141-142
How to cite this article:
राकेश कवचे "योग दर्शन में आत्मा का स्वरूपः एक दार्शनिक विवेचन". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 141-142
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