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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
सांख्य एवं योग में बंध एवं मोक्ष की अवधारणा
Authors
हर्षवर्धन गोस्वामी
Abstract
भारतीय दर्शन शास्त्रों का मुख्य लक्ष्य वही है जो मनुष्य के जीवन का है। मनुष्य के जीवन में दुःख के अनुभव के साथ ही उसकी निवृत्ति के उपायों के लिए जिज्ञासा भी उत्पन्न होती है। समय-समय पर जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जीवन यात्रा के भिन्न-भिन्न स्तरों में साधक को क्रमशः दुःख निवृत्ति के कुछ अंशों का भी अनुभव होता रहता है और इसी से प्रोत्साहित होकर साधक एक भूमि से दूसरी भूमि पर जाने के लिए प्रयत्न करता रहता है, जिसे मानव जीवन का व्यावहारिक रूप कहा जाता है और यही बात सिद्धांत रूप में ‘सांख्य दर्शन’ में है। सांख्य के अनुसार वैदिक यज्ञ अहिंसा के नियम का उल्लंघन करते हैं। जब यज्ञ किया जाता है तो हम स्वर्ग प्राप्ति करा सकते हैं। जहाँ से पुण्यों से क्षय होने पर साधक को लौटना पड़ता है। यह कर्मकाण्ड विवेक ज्ञान के उदय में सहायक नहीं होते। विवेक ज्ञान को ही मोक्ष स्वीकार करने के कारण कर्मों के प्रति सांख्य का दृष्टिकोण प्रायः वैसा ही है जैसा कि शंकर का है। शुभाशुभ कर्म हमें क्रमशः स्वर्ग और नरक की प्राप्ति करा सकते हैं। कैवल्य की प्राप्ति नहीं। कैवल्य अज्ञान दूर होना है, क्योंकि केवल ज्ञान के उदय होने से भी ंसभव है। बंधन का कारण अज्ञान है और इसका नाश केवल ज्ञान प्राप्ति से ही होता है। ज्ञान और केवलज्ञान से ही कैवल्य प्राप्त होता है। सांख्य के अनुसार अष्टांग योग का अभ्यास विवेक ज्ञान के उदय में सहायक है। पुरूष और प्रकृति में द्वैत ज्ञान ही कैवल्य है।
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Pages:115-118
How to cite this article:
हर्षवर्धन गोस्वामी "सांख्य एवं योग में बंध एवं मोक्ष की अवधारणा". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 115-118
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