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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
मोहन राकेश के व्यक्तित्व में विसंगतियाँ
Authors
डॉ. अरविंद कुमार
Abstract
इस शोध पत्र में मोहन राकेश के व्यक्तित्व में विसंगतियों पर प्रकाश डाला गया है। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य पर सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। मनुष्य परिस्थितियों का दास बनकर विसंगत जीवन जीने के लिए विवश है। मोहन राकेश के विसंगति युक्त व्यक्तित्व का प्रभाव उनके साहित्य पर भी पड़ा है। प्राय: देखा गया है कि किसी भी साहित्यकार के जीवन की सम-विषम परिस्थितियों की छाया उसके साहित्य पर अवश्य पड़ती है। मोहन राकेश को विपन्न आर्थिक स्थिति विरासत में मिली थी। पिता की मृत्यु के समय माता की सोने की चूड़ियाँ बेचकर मकान मालिक का कर्ज़ चुकाना समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है। संभवत: इसी घटना ने मोहन राकेश के जीवन-जीने के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दिया। मोहन राकेश के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव उनकी माता जी का पड़ा। आर्थिक विवशता के कारण मृत्युशैय्या पर पड़ी प्रेमिका से मिलने न जा पाना, समय-समय पर अभिन्न मित्रों द्वारा छले जाने के कारण उनका कुंठा, अविश्वास से परिपूर्ण व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है। मोहन राकेश की घर बनाने की चाहत जीवन भर अधूरी रही। आधुनिक नाटकों का मसीहा कहा जाने वाला, नयी कहानी आंदोलन का मुख्य सूत्रधार, अपने जीवन में बरबस आई विसंगतियों से आत्मसात करता हुआ साहित्य सृजन करता रहा। आधुनिक युग में किसी आदर्श की कल्पना करना असंगत होगा। मोहन राकेश का साहित्य यथार्थवादी साहित्य है। यथार्थ को व्यक्ति स्वयं भोगता है। मोहन राकेश ने अपने निज जीवन में भोगे हुए यथार्थ को साहित्य में अभिव्यक्ति दी है। दूसरों की समस्याओं को चुटकी में हल करने वाला राकेश अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से पार न पा सका।
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Pages:91-95
How to cite this article:
डॉ. अरविंद कुमार "मोहन राकेश के व्यक्तित्व में विसंगतियाँ ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 91-95
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