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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
योग में चित्त शुद्धि
Authors
हर्षवर्धन गोस्वामी
Abstract
चित्त प्रकृति का सात्विक परिणाम है प्रकृति त्रिगुणात्मक है, अतः चित्त भी त्रिगुणात्मक है। त्रिगुणात्मक होते हुए भी इसकी रचना में सब की प्रधानता होती है। अतः यह प्रकृति का प्रथम सात्विक परिणाम माना जाता है। चित्त का स्वरूप तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता है। जब तक चित्त का स्वरूप न जान लिया जाये। सांख्य और योगमत में चित्त् चिति, चैतन्य पुरूष और आत्मा ये सब पर्यायवाचक शब्द है। चित् अपने आप में अपरिणामी, कूटस्थ और निष्क्रिय है, इसी चित् अथवा पुरूष तत्व को योग और मोक्ष प्राप्त करने के लिये इसके साथ प्रकृति का संयोग होता है। प्रकृति का प्रथम परिणाम रूप बुद्धि या चित्त तत्व ही योग और मोक्ष का प्रयोजन सिद्ध करता है।
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Pages:158-161
How to cite this article:
हर्षवर्धन गोस्वामी "योग में चित्त शुद्धि". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 158-161
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