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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 6 (2021)
प्रसाद के काव्य की प्रासंगिकता
Authors
डॉ. आशुतोष कुमार द्विवेदी, पद्मिनी द्विवेदी
Abstract
कामायनी महाकाव्य, स्कंदगुप्त तथा चन्द्रगुप्त जैसे कालजयी नाटकों के विरूद्ध सामाजिक - राजनीतिक दृष्टि से कतिपय आक्षेप किये गये हैं। इन आलोचकों का तर्क है कि कामायनी की कथा - वस्तु अत्यंत सुदूर अतीत से सम्बन्ध होने के कारण वर्तमान जीवन की समस्याओं से सर्वथा पराड्मुख है। वह मानव - जीवन की विषमताओं का जो समाधान प्रस्तुत करती है, वह यथार्थ से एकदम दूर और एकांत रहस्यात्मक है। मानव - सभ्यता के विकास का यह कैसा अभिलेख हैं जिसमें इतिहास को मोड़ देने वाले महान आंदोलनों का प्रतिबिंब भी नहीं मिलता। शायद इसी मानसिकता के कारण यह कहा गया है कि प्रसाद हमारे लिए आज उतने प्रासंगिक नहीं हैं जितने प्रेमचन्द और निराला इन आक्षेपों में प्रासंगिकता के प्रत्यक्ष और एक सीमा तक सतही रूप को ग्रहण किया गया है। वास्तव में यथार्थ के दो स्तर होते हैं - एक प्रत्यक्ष और दूसरा मौलिक या तात्विक। इसी तरह प्रासंगिकता के भी दो स्तर होते है।
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Pages:16-17
How to cite this article:
डॉ. आशुतोष कुमार द्विवेदी, पद्मिनी द्विवेदी "प्रसाद के काव्य की प्रासंगिकता ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 6, 2021, Pages 16-17
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