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VOL. 7, ISSUE 6 (2021)
वैष्णव पाणी के गीतिनाट्य में जनवादी चेतना
Authors
चिन्मयी मिश्र
Abstract
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम भाग में ओडिशा की सामाजिक व्यवस्था, प्रशासन की कानून-व्यवस्था के साथ समान्तराल रूप से अलग प्रकार के ढंग से चल रही थी। सामाजिकता तथा धार्मीक भावावेग को ढाल बना कर धनीक वर्ग सरल, अनपढ, गरीब जनता पर अत्याचार तथा शोषण कर रहे थे। कवि वैष्णव पाणि का कवि- मानस इसे देख कर बेचौन होने लगा तथा सामाजिक परिवर्त्तन की तरकीबें सोचने लगा। दोनों वर्गों (धनीक, गरिब) की मानसिकता में जब तक परिवर्त्तन नहीं आयेगा, तब तक सामाजिक उत्थान असम्भव है। धनीक वर्ग को समझना चाहिए कि जिन गरिबों का वे शोषण कर रहे हैं, वे भी उनकी तरह इंसान हैं। इन गरिबों की बदौलत परिश्रम न करके भी वे शान-शौकत के साथ आसान की जिंदगी जी रहे हैं। दूसरे पक्ष में गरीबों में यह चेतना भरनी चाहिए कि आजादी उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। किसी का अत्याचार एवं शोषण को झेलने के लिए उनका जन्म नहीं हुआ है। एक जनवादी दृष्टिकोण को लिए हुए वैष्णवपाणि जन- साधारणों में सामाजिक क्रांति की भावना भरने के लिए गीतिनाट्य लिखने लगे। अनपढ देहातियों की समझ में आये इसीलिए सरल देहाती भाषा को गीतिनाट्य की भाषा के रूप में चुनी एवं ज्यादातर कथावस्तुएँ पुराणों से लीं। गीतिनाट्यकार भिन्न-भिन्न प्रसंगों के बीच में तत्कालिन सुलगती समस्याओं जैसे अशिक्षा, कुसंस्कर, नशाखोरी, जात-पाँत की भेद-भावना, धनीकों की अहमिका, अवलाओं पर निर्यातना एवं परतंत्रता आदि के खिलाफ आवाज बुलंद करने लगे और उनके निराकरण के सुझाव भी बताते रहे जिनका अच्छा-खासा असर देहातियों में दिखाई देने लगा।)
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Pages:61-64
How to cite this article:
चिन्मयी मिश्र "वैष्णव पाणी के गीतिनाट्य में जनवादी चेतना ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 6, 2021, Pages 61-64
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