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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 6 (2021)
स्त्री सशक्तिकरण के मायने
Authors
डॉ. घनश्याम दास
Abstract
स्त्री प्राचीन काल से शोषित और पीड़ित रही है। उसके अधिकारों पर पितृसत्ता ने कुठाराघात किया और उसे अधोगति के लिए विवश किया। पितृसत्ता ने स्त्री की मानसिकता को कुंद किया और उसके विकास के मार्ग को अवरुद्ध करने का कार्य किया। आधुनिक युग आते-आते स्त्री की स्थिति में परिवर्तन हुआ और धीरे-धीरे पितृसत्ता के षड्यंत्र को स्त्री ने पहचाना और उसके खिलाफ आवाज बुलंद की। आज जबकि हम उत्तर आधुनिक दौर में हैं जहां पुराने मूल्य और परंपराएं ध्वस्त हो रही हैं और विमर्शों के एक नए युग का आगाज हो रहा है, ऐसे में स्त्री भी अपनी अस्मिता के लिए उठ खड़ी हुई है और पूरी ताकत के साथ चुनौतियों का सामना कर रही है। वह अपने सशक्तिकरण के मार्ग की ओर लगातार प्रयासरत है। वह आज अर्थोपार्जन भी कर रही है और साथ-साथ सामाजिक तथा राजनीतिक भागीदारी में भी हिस्सेदारी दिखा रही है। उसकी सामाजिक हैसियत में भी सकारात्मक बदलाव रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी वह पुरुष से किसी मायने में कम नहीं दिखती। वह शिक्षा ग्रहण भी कर रही है और समाज को शिक्षित भी कर रही है।
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Pages:38-43
How to cite this article:
डॉ. घनश्याम दास "स्त्री सशक्तिकरण के मायने ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 6, 2021, Pages 38-43
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