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VOL. 7, ISSUE 6 (2021)
श्रीमद्भागवत गीताः मृत्यु विषाद या हर्ष बेला
Authors
नीलिमा, डॉ. बृजलता शर्मा
Abstract
मानव समाज में मृत्यु के प्रति जो संवेदनशील दृष्टिकोण प्रचलित है, वह पूर्णतया भावनाओं पर आधारित होने के साथ-साथ कुछ हद तक डर,चिन्ता, त्रासदी,दुख एवं परंपराओं के ताने-बाने में उलझकर रह गया है। जबकि अध्यात्मिक दर्शनानुसार मृत्यु अवस्था वास्तव में अपने आप में एक पृथक अस्तित्व को संजोकर रखने वाली स्थिति है। परंपरा अर्थात किसी भी व्यक्ति के मृत्यु उपरांत की जाने वाली ऐसी सम्पूर्ण प्रक्रिया (विषाद, दुरूख, रोना, चीखना, दान-दक्षिणा, विचार, रीति रिवाज़ और औपचारिकताएं आदि, अर्थात मृत्योपरांत कुछ समय तक अपनाये जाने वाले अनिवार्य नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना।) जिसका आधार किस सत्यता पर निर्भर है और कितना उचित-अनुचित है, यह प्रमाणिकतायुक्त है भी या नहीं; इस विषय पर अपने आप में एक भ्रामक स्थितियों का ताना-बाना बुना हुआ है। इस असमंजस की स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का श्रेय केवल क्षेत्रीय परंपराओं के प्रभाव और लोभी धर्म-कर्मियों ने अपनी-अपनी इच्छा अनुसार व निराधार पक्षपातपूर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए समाज में एक भ्रम की स्थिति को स्थापित कर दिया जो निरंतर जारी है क्योंकि यह मानव जीवन की एक ऐसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो सम्पूर्ण संसार में हर दस कोस की दूरी पर अलग-अलग रूपों में देखने-सुनने को मिलती है। इस पक्षपातपूर्ण और स्वार्थ प्रेरित स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान से ही प्रत्येक व्यक्ति को स्वआचरण में सात्विकता का अनुकरण करते हुए परिवर्तन करने से, हमारे साथ जो आने वाली पीढ़ी आज बाल्यवस्था में है, ये ही हमारे भविष्य में आने वाली युवा पीढ़ी बनकर ज्ञान-विज्ञान पर आधारित एवं पुरातन शाश्वत मूल्यों पर आधारित शिक्षाओं को दिन-प्रतिदिन के जीवन-यापन की शैली में अनुकरण कर भ्रामकता को समाप्त करने में सहयोगी व सक्षम होगी । हम सभी को लोक कल्याण हेतु अति आवश्यक कर्तव्यों की श्रेणी में शास्त्रों पर आधारित ज्ञान को आरम्भ से ही शिक्षा पद्धति में सम्मिलित करना होगा। वर्तमान समय में कोरोना वायरस महामारी की विषम परिस्थितियों से भी शिक्षा ग्रहण करते हुए हमें स्वआचरण की शुद्धि द्वारा ही संभवतया मानव जीवन की सार्थकता के विकास में योगदान देने वाले नियमों को ही जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए। हमारे अपने जीवन में होने वाले अनुभवों से और समाज में चारों ओर व्याप्त अनेक प्रकार के रीति रिवाजों को लेकर कुछ भ्रमों में से अत्यधिक महत्वपूर्ण भ्रामक प्रश्न है, उनमें से एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न है ‘मृत्यु अवस्था वास्तव में हर्षाेल्लास का अवसर है या दुःख का अवसर है।’
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Pages:77-82
How to cite this article:
नीलिमा, डॉ. बृजलता शर्मा "श्रीमद्भागवत गीताः मृत्यु विषाद या हर्ष बेला ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 6, 2021, Pages 77-82
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